प्रस्तावित जनजाति सम्मेलन सीमांत के बजाय राजधानी देहरादून में कराये जाने से सीमांत जनजाति के लोगों में आक्रोश

 

 

  • संतोष साह

 

 

निदेशालय, जनजाति कल्याण उत्तराखंड द्वारा दो साल से मुनस्यारी पिथौरागढ़ में प्रस्तावित जनजाति सम्मेलन को अब देहरादून में आयोजित किए जाने पर सीमांत जनजाति के लोग भड़क गए है। इनका आरोप है कि धामी सरकार नौकरशाहो के हाथो से चल रही है। दरअसल मुनस्यारी में दो साल पहले से राष्ट्रीय स्तर के जनजाति सम्मेलन की तैयारी की जा रही थी। सम्मेलन के लिए यहां दर्जनो बार बैठक हुई। एसडीएम की अध्यक्षता में आयोजन को लेकर कमेटियो का गठन भी किया गया था। कोविड 19 के कारण सम्मेलन आयोजित नहीं हो पा रहा था। इस सम्मेलन में देश भर से जनजातियो के प्रतिनिधियो को आना था। सीमांत के विकास एवं उत्तराखंड की जनजातियो के सांस्कृतिक विरासत से देशभर की जनजातियां रुबरु होती। भारत-चीन सीमा पर होने वाले इस सम्मेलन से राज्य के इस दुर्गम हिस्से को नयी पहचान मिलनी तय थी। यहां के विकास के नये आयाम भी लिखे जाते। क्षेत्र की जनजाति कोविड 19 के नियमो के ढ़ील का इंतजार कर रही थी मगर नौकरशाही ने सम्मेलन के स्तर को राष्ट्रीय से राज्य स्तरीय बना दिया। इतना ही नहीं सम्मेलन के लिए पूर्व में प्रस्तावित स्थल मुनस्यारी को बदलकर देहरादून कर दिया। दून में सम्मेलन 10 नवम्बर से तीन दिनो तक चलने वाला है। सरकार के इस फैसले पर मुनस्यारी के जिला पंचायत सदस्य जगत मर्तोलिया, ग्राम प्रधान मनोज मर्तोलिया, कृष्णा पंचपाल, ललिता मर्तोलिया, सावित्री पांगती, गोकरण पांगती, लक्ष्मी रिलकोटिया, पंकज बृजवाल, हरेन्द्र बर्निया, महेश रावत सहित दो दर्जन पंचायत प्रतिनिधियों ने कहा कि सरकार ने अगर सभी सम्मेलन देहरादून में सुविधायुक्त स्थानो में ही कराने हैं तो फिर मुनस्यारी के जनजातियो को आज तक क्यो बेवकूफ़ बनाया?

पंचायत प्रतिनिधियो ने यह भी कहा है कि दुरस्थ क्षेत्रो में इस तरह के आयोजन होने ही नहीं है, तो फिर क्यों पृथक राज्य मांगा गया था।

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