उत्तरकाशी : जमदग्नि ऋषि आश्रम में ऋषि पंचमी महोत्सव का हुआ आयोजन तो देव डोलियों का भी हुआ संगम

  • संतोष साह

जमदग्नि ऋषि आश्रम में ऋषि पंचमी महामहोत्सव के पावन पर्व पर देव डोलियों के आगमन के साथ भारी संख्या में भक्त,श्रद्धालु,ग्रामीण पहुंचे। यह पहला मौका है जब यमुना घाटी के थान गांव में इस महोत्सव पर स्थानीय देव डोलियों का भी संगम हुआ और लोगों का आशीर्वाद को लेकर हुजूम उमड़ा। सरनौल से रेणुका देवी,कोटी से राजा रघुनाथ की डोली,डख्याट गांव से तटेश्वर महादेव,कुपडा से शेषनाग,पाली से जाख सोमेश्वर,ओजरी से मां राजेश्वरी,कुथनॉर से कैलापीर,स्यालब से राज राजेश्वरी समेत कई अन्य देव डोलियां इस पावन पर्व पर शरीक हुईं।

थान गांव के जमदग्नि ऋषि आश्रम,मंदिर में इस पावन पर्व के संचालन के लिये बनी समिति में संरक्षक गोविंद राम डिमरी,अध्यक्ष शांति प्रसाद डिमरी,उपाध्यक्ष सुमन प्रसाद डिमरी,सचिव अनुसूया प्रसाद डिमरी,कोषाध्यक्ष गणेश प्रसाद डिमरी शामिल हैं जिनके द्वारा इस महोत्सव में सुगम व्यवस्था के साथ ही इसे भव्य रूप दिया गया है।
उधर ऋषि पंचमी को लेकर चंद्र शेखर नौटियाल ने जो संकलन किया है और इसके महत्व को दर्शाया है उसमें ऋषि पञ्चमी का विशेष महत्व है।

उन्होंने अपने संकलन में उल्लेख किया है कि ऋषि पञ्चमी व्रत भाद्रपद शुक्ल
पंचमी को मनाया जाता है और यहव्रत जाने अन्जाने मे हुये पापों के प्रक्षालन के लिये किया जाता है। इसके अलावा कई समाज इस दिन “रक्षाबंधन” भी करतें हैं।
ऋषि पंचमी महामहोत्सव में विशेषकर ऋषि मन्त्र द्रष्टा, मन्त्र स्रष्टा और युग सृजेता होते हैं। समाज में जो भी उत्तम प्रचलन, प्रथा-परम्पराएं हैं उनके प्रेरणा स्रोत ऋषिगण ही हैं-यथा-व्यासजी ने गहन वेद ज्ञान को सुबोध्य पुराण ज्ञान के रूप में रूपान्तरित कर ज्ञानार्जन का मार्ग प्रशस्त किया। चरक, सुश्रुतादि ने आयुर्विज्ञान पर अनुसन्धान किए।
जमदग्नि,याज्ञबल्क्य ने यज्ञ विज्ञान पर शोध प्रयोग किये। वशिष्ठ ने ब्रह्मविद्या व राजनीति विज्ञान तथा विश्वामित्र ने
गायत्री महाविद्या का रहस्योद्घाटन
किया।

नारद जी ने भक्ति साधना के अनमोल सूत्र दिए। परशुराम ने
ऊंच-नीचादि जातिगत भेद-वैमनष्य का निराकरण किया। भगीरथ ने
जल विज्ञान की महत्ता को समझकर धरती पर गंगावतरण का पुनीत पुरुषार्थ किया। पतंजलि ने योग विज्ञान की विविध साधना मार्ग
प्रस्तुत किए तो इसके अलाव अन्य ऋषियों ने भी व्यापक समाज हित के कार्य किए
हैं जिनका मानव जाति सदा ऋणी रही है। ये सभी ऋषि भारतीय संस्कृति के उन्नायक, युग सृजेता, मुक्तिमार्ग का पथ-प्रदर्शक, राष्ट्रधर्म के संरक्षक, व्यष्टि-समष्टि की समस्त गति, प्रगति और सद्गति के
उद्गाता हैं। संसार के तमाम रहस्यमय विद्याओं की खोज, प्रयोग, समाज में सत्पात्रों को उनकी शिक्षा दीक्षा, उनकी सहायता से अभिनव समाज निर्माण जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य सब महान ऋषियों की ही देन हैं।

श्री नौटियाल ने यह भी जिक्र किया है कि भाद्रपद शुक्ल ऋषि पंचमी व्रत के दिन व्रत करने वाले को गंगा,
नर्मदा या किसी अन्य नदी अथवा सरोवर तालाब में स्नान करना चाहिये तत्पश्चात पूजा,तरपान आदि। उनका यह भी मानना है कि प्सप्तर्षियों की पूजा से सभी दुख दूर भी होते हैं।
इसी पर्व को लेकर एक व्रत कथा का जो संकलन चंद्र शेखर नौटियाल ने किया है उसके अनुसार-
एक साहूकार साहुकारनी थे। साहुकारनी रजस्वला होकर रसोई के सब काम करती थी। कुछ समय बाद उसके एक पुत्र हुआ। पुत्र का विवाह हो गया। साहूकार ने अपने घर एक ऋषि महाराज को भोजन पर बुलाया। ऋषि महाराज ने कहा मैं बारह वर्ष में एक बार खाना खाता हूँ। पर साहूकार ने महाराज को मना लिया। साहूकार ने पत्नी से कहा आज ऋषि महाराज भोजन पर आयेंगे। उस समय स्त्री रजस्वला थी उसने भोजन बनाया और ऋषि को भोजन परोसते ही भोजन कीड़ो में बदल गया यह देख ऋषि ने साहूकार साहुकारनी को श्राप दे दिया , की तू अगले जन्म में कुतिया बनेगी और तू बैल बनेगा। साहूकार ने ऋषि के पांव पकड़ बहुत विनती की तब ऋषि ने कहा तेरे घर में ऐसी कोई वस्तु हैं क्या जिस को तेरी पत्नी की नजर नहीं पड़ी , नहीं छुआ। तब साहूकार ने छिके पर दही पड़ा था ऋषि को पिलाया।


ऋषि हिमालय पर तपस्या के लिए चले गये। साहूकार साहुकरनी की मृत्यु हो गई श्राप वश साहूकार बैल बन गया और साहुकारनी कुतिया बन गई। दोनों अपने बेटे के घर पर रहने लगे। साहूकार का बेटा बैल से बहुत काम लेता खेत जोतता , खेत की सिचाई करता। कुतिया घर की चौकीदारी करती।

एक वर्ष बीत गया उस लडके के पिता का श्राद्ध आया। श्राद्ध के दिन अनेक पकवान बनाये खीर भी बनाई थी। एक उडती हुई चील के मुहं का सर्प उस खीर में गिर गया यह वहाँ बैठी कुतिया ने देख लिया। कुतिया ने सोचा यदि इस खीर को लोग खायेगे तो मर जायेंगे जब उसकी बहूँ देख रही थी कुतिया ने खीर में मुंह डाल दिया क्रोध में आकर बेटे बहूँ ने बहुत मारा।

जब रात हुई तो कुतिया बैल के पास जाकर रोने लगी बोली आज तुम्हारा श्राद्ध था बहुत पकवान मिले होंगे तब बैल ने कहा आज खेत पर बहुत काम था और खाना भी नही मिला कुतिया ने भी अपनी आप बीती बता दी और कहा आज बेटे बहूँ ने बहुत मारा यह सारी बाते बेटे ने सुन ली बेटे ने बहुत बड़े बड़े ऋषि मुनियों को बुलाया ऋषि मुनियों को सारी बात बताई तब ऋषि मुनियों ने कहा “ तुम्हारे यहाँ जो कुतिया हैं वह तुम्हारी माँ हैं और बैल रूप में तुम्हारे पिता हैं। तब लडके ने माता पिता को इस योनी से किस प्रकार मुक्ति मिलेगी इसका उपाय पूछा तब ऋषियों ने कहा ! ऋषि पंचमी को ऋषियों का पूजन कर उस ब्राह्मण भोज का पूण्य इन्हें मिले तथा ऋषिगण अपना आशीर्वाद दे। व्रत के पुण्य से तुम्हारे माता पिता इस योनी से मुक्त होकर स्वर्ग में स्थान प्राप्त करेंगे। उसने ऐसा ही किया और स्वर्ग से विमान आया और उस लडके के माता पिता को मोक्ष प्राप्त हुआ।

You may have missed