भाद्र माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है यह त्यौहार , राधा अष्टमी पर विशेष लेख —–

लेखक —-अनुराग गुप्ता
सनसनी सुराग न्यूज़

 

भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को श्रीकृष्ण की बाल सहचरी, जगजननी भगवती शक्ति राधाजी का जन्म हुआ। राधा के बिना श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व अपूर्ण है। यदि श्रीकृष्ण के साथ से राधा को हटा दिया जाए तो श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व माधुर्यहीन हो जाता। राधा के ही कारण श्रीकृष्ण रासेश्वर हैं।
“जगत जननी राधा को भगवान श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति माना गया है।”
यानी राधा के कारण श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं। पद्म पुराण में कहा गया है कि राधा श्रीकृष्ण की आत्मा हैं। महर्षि वेदव्यास ने लिखा है कि श्रीकृष्ण आत्माराम हैं और उनकी आत्मा राधा हैं। श्रीहरिवंश महाप्रभु ने तो श्रीराधा को श्रीकृष्ण से भी अधिक प्रधानता दी है। उन्होंने उन्हें अपना इष्ट और गुरु दोनों ही माना है। उन्होंने अपने संप्रदाय का नाम भी श्रीराधावल्लभ संप्रदाय रखा। जो भी हो, ब्रज में राधा की श्रीकृष्ण से अधिक मान्यता है। यहां हरेक शुभ कार्य का श्रीगणेश श्री राधे के स्मरण से एवं अभिवादन राधे-राधे कहकर किया जाता है, आखिर राधा लोक पितामह ब्रह्मा एवं भगवान शिव तक की भी वंदनीय और उपास्य जो हैं। एक कथा के अनुसार, ब्रह्माजी द्वारा वरदान प्राप्त कर राजा सुचंद्र एवं उनकी पत्‍‌नी कलावती कालांतर में वृषभानु एवं कीर्तिदा हुए। इन्हीं की पुत्री के रूप में राधारानी ने मथुरा के गोकुल-महावन कस्बे के निकट रावल ग्राम में जन्म लिया। श्रीराधा के जन्म के संबंध में कहा जाता है कि वृषभानु भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को जब एक सरोवर के पास से गुजर रहे थे, तो उन्हें एक कुंज की झुकी वृक्षावलि के पास एक बालिका कमल के फूल पर तैरती हुई मिली, जिसे उन्होंने अपनी पुत्री के रूप में अपना लिया। कथा के अनुसार, बाद में वृषभानु कंस के अत्याचारों से तंग होकर रावल से बरसाना चले गए। एक बार जब कंस, वृषभानु जी को मारने के लिए अपनी सेना सहित बरसाना की ओर चला तो वह बरसाना की सीमा में घुसते ही स्त्री बन गया और उसकी सारी सेना पत्थर की बन गई। जब देवर्षि नारद बरसाना आए तो कंस ने उनके पैरों पर पड़कर सारी घटना सुनाई। नारद जी ने इसे राधा जी की महिमा बताई। वे उसे वृषभानु जी के महल में ले गए। कंस के क्षमा मांगने पर राधा ने उससे कहा कि अब तुम यहां छह महीने गोपियों के घरेलू कामों में मदद करो। कंस ने ऐसा ही किया। छह माह बाद उसने जैसे ही वृषभानु कुंड में स्नान किया, वह अपने पुरुष वेश में आ गया। फिर कभी उसने बरसाना की ओर मुड़कर नहीं देखा। रस साम्राज्ञी राधा रानी ने नंदगांव में नंद बाबा के पुत्र के रूप में रह रहे भगवान श्रीकृष्ण के साथ समूचे ब्रज में आलौकिक लीलाएं कीं, जिन्हें पुराणों में माया के आवरण से रहित जीव का ब्रह्म के साथ विलास बताया गया है। एक किंवदंती के अनुसार, एक बार जब श्रील नारायण भट्ट बरसाना स्थित ब्रह्मेश्वर गिरि पर गोपी भाव से विचरण कर रहे थे, उन्होंने देखा कि राधा रानी भी भगवान श्रीकृष्ण के साथ विचरण कर रही हैं। राधा जी ने उनसे कहा कि इस पर्वत पर मेरी एक प्रतिमा विराजित है, उसे तुम अ?र्द्धरात्रि में निकालकर उसकी सेवा करो। भट्ट जी इस प्रतिमा का अभिषेकादि कर पूजन करने लगे। इसके बाद ब्रह्मेश्वर गिरि पर राधा रानी का भव्य मंदिर बनवाया गया, जिसे श्रीजी का मंदिर या लाडिली महल भी कहते हैं। राधा रानी की श्रीकृष्ण में अनन्य आस्था थी। वह उनके लिए हर क्षण अपने प्राण तक न्योछावर करने के लिए तैयार रहती थीं। विभिन्न पुराण, धार्मिक ग्रंथ एवं अनेक विद्वानों की पुस्तकें उनकी यशोगाथा से भरी पड़ी हैं। राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र में कहा गया है कि अनंत कोटि बैकुंठों की स्वामिनी लक्ष्मी, पार्वती, इंद्राणी एवं सरस्वती आदि ने राधा रानी की पूजा-आराधना कर उनसे वरदान पाया था। राधा चालीसा में कहा गया है कि जब तक राधा का नाम न लिया जाए, तब तक श्रीकृष्ण का प्रेम नहीं मिलता। वृंदावन में राधाष्टमी पर सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र श्रीराधावल्लभ मंदिर रहता है। इस मंदिर में युगल उपासना की परंपरा है। यहां राधा रानी के जन्म की खुशी में जमकर दधिकादा होता है। पूरा मंदिर राधा प्यारी ने जन्म लियो है. की गूंज से भर जाता है। रात्रि को श्रीराधावल्लभ की सवारी निकाली जाती है। इसके अलावा वृंदावन में अनेक मंदिरों व धार्मिक स्थलों पर भी राधा रानी का जन्मोत्सव राधाष्टमी पर्व के रूप में अत्यधिक धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
कृष्ण प्रिया राधा का रहस्य, —पौराणिक कथाएं ….
कथा -1
राधा द्वापर युग में श्री वृषभानु के घर प्रगट होती हैं। कहते हैं कि एक बार श्रीराधा गोलोकविहारी से रूठ गईं। इसी समय गोप सुदामा प्रकट हुए। राधा का मान उनके लिए असह्य हो हो गया।

उन्होंने श्रीराधा की भर्त्सना की, इससे कुपित होकर राधा ने कहा- सुदामा! तुम मेरे हृदय को सन्तप्त करते हुए असुर की भांति कार्य कर रहे हो, अतः तुम असुरयोनि को प्राप्त हो। सुदामा कांप उठे, बोले-गोलोकेश्वरी ! तुमने मुझे अपने शाप से नीचे गिरा दिया। मुझे असुरयोनि प्राप्ति का दुःख नहीं है, पर मैं कृष्ण वियोग से तप्त हो रहा हूं। इस वियोग का तुम्हें अनुभव नहीं है अतः एक बार तुम भी इस दुःख का अनुभव करो। सुदूर द्वापर में श्रीकृष्ण के अवतरण के समय तुम भी अपनी सखियों के साथ गोप कन्या के रूप में जन्म लोगी और श्रीकृष्ण से विलग रहोगी। सुदामा को जाते देखकर श्रीराधा को अपनी त्रृटि का आभास हुआ और वे भय से कातर हो उठी। तब लीलाधारी कृष्ण ने उन्हें सांत्वना दी कि हे देवी ! यह शाप नहीं, अपितु वरदान है। इसी निमित्त से जगत में तुम्हारी मधुर लीला रस की सनातन धारा प्रवाहित होगी, जिसमे नहाकर जीव अनन्तकाल तक कृत्य-कृत्य होंगे। इस प्रकार पृथ्वी पर श्री राधा का अवतरण द्वापर में हुआ।
कथा 2 – नृग पुत्र राजा सुचन्द्र और पितरों की मानसी कन्या कलावती ने द्वादश वर्षो तक तप करके श्रीब्रह्मा से राधा को पुत्री रूप में प्राप्ति का वरदान मांगा। फलस्वरूप द्वापर में वे राजा वृषभानु और रानी कीर्तिदा के रूप में जन्मे। दोनों पति-पत्नी बने। धीरे-धीरे श्रीराधा के अवतरण का समय आ गया। सम्पूर्ण व्रज में कीर्तिदा के गर्भधारण का समाचार सुख स्त्रोत बन कर फैलने लगा, सभी उत्कण्ठा पूर्वक प्रतीक्षा करने लगे। वह मुहूर्त आया। भाद्रपद की शुक्ला अष्टमी चन्द्रवासर मध्यान्ह के समये आकाश मेघाच्छन्न हो गया। सहसा एक ज्योति प्रसूति गृह में फैल गई यह इतनी तीव्र ज्योति थी कि सभी के नेत्र बंद हो गए। एक क्षण पश्चात् गोपियों ने देखा कि शत-सहस्त्र शरतचन्द्रों की कांति के साथ एक नन्हीं बालिका कीर्तिदा मैया के समक्ष लेटी हुई है। उसके चारों ओर दिव्य पुष्पों का ढेर है। उसके अवतरण के साथ नदियों की धारा निर्मल हो गई, दिशाएं प्रसन्न हो उठी, शीतल मन्द पवन अरविन्द से सौरभ का विस्तार करते हुए बहने लगी।
कथा 3 : पद्मपुराण में राधा का अवतरण

पद्मपुराण में भी एक कथा मिलती है कि श्री वृषभानुजी यज्ञ भूमि साफ कर रहे थे, तो उन्हें भूमि कन्या रूप में श्रीराधा प्राप्त हुई। यह भी माना जाता है कि विष्णु के अवतार के साथ अन्य देवताओं ने भी अवतार लिया, वैकुण्ठ में स्थित लक्ष्मीजी राधा रूप में अवतरित हुई। कथा कुछ भी हो, कारण कुछ भी हो राधा बिना तो कृष्ण हैं ही नहीं। राधा का उल्टा होता है धारा, धारा का अर्थ है करंट, यानि जीवन शक्ति। भागवत की जीवन शक्ति राधा है। कृष्ण देह है, तो श्रीराधा आत्मा। कृष्ण शब्द है, तो राधा अर्थ। कृष्ण गीत है, तो राधा संगीत। कृष्ण वंशी है, तो राधा स्वर। भगवान् ने अपनी समस्त संचारी शक्ति राधा में समाहित की है। इसलिए कहते हैं-

जहां कृष्ण राधा तहां जहं राधा तहं कृष्ण।
न्यारे निमिष न होत कहु समुझि करहु यह प्रश्न।।

इस नाम की महिमा अपरंपार है। श्री कृष्ण स्वयं कहते है- जिस समय मैं किसी के मुख से ‘रा’ सुनता हूं, उसे मैं अपना भक्ति प्रेम प्रदान करता हूं और धा शब्द के उच्चारण करनें पर तो मैं राधा नाम सुनने के लोभ से उसके पीछे चल देता हूं। राधा कृष्ण की भक्ति का कालान्तर में निरन्तर विस्तार हुआ। निम्बार्क, वल्लभ, राधावल्लभ, और सखी समुदाय ने इसे पुष्ट किया। कृष्ण के साथ श्री राधा सर्वोच्च देवी रूप में विराजमान् है। कृष्ण जगत् को मोहते हैं और राधा कृष्ण को। 12वीं शती में जयदेवजी के गीत गोविन्द रचना से सम्पूर्ण भारत में कृष्ण और राधा के आध्यात्मिक प्रेम संबंध का जन-जन में प्रचार हुआ।
“भागवत में राधिका-प्रसंग”——

अनया आराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतोयामनयद्रहः।
प्रश्न उठता है कि तीनों लोकों का तारक कृष्ण को शरण देनें की सामर्थ्य रखने वाला ये हृदय उसी आराधिका का है, जो पहले राधिका बनी। उसके बाद कृष्ण की आराध्या हो गई। राधा को परिभाषित करनें का सामर्थ्य तो ब्रह्म में भी नहीं। कृष्ण राधा से पूछते हैं- हे राधे ! भागवत में तेरी क्या भूमिका होगी ? राधा कहती है- मुझे कोई भूमिका नहीं चाहिए कान्हा ! मैं तो तुम्हारी छाया बनकर रहूंगी। कृष्ण के प्रत्येक सृजन की पृष्ठभूमि यही छाया है, चाहे वह कृष्ण की बांसुरी का राग हो या गोवर्द्धन को उठाने वाली तर्जनी या लोकहित के लिए मथुरा से द्वारिका तक की यात्रा की आत्मशक्ति।

आराधिका में आ को हटाने से राधिका बनता है। इसी आराधिका का वर्णन महाभारत या श्रीमद्भागवत में प्राप्त है और श्री राधा नाम का उल्लेख नहीं आता। भागवत में श्रीराधा का स्पष्ट नाम का उल्लेख न होने के कारण एक कथा यह भी आती है कि शुकदेव जी को साक्षात् श्रीकृष्ण से मिलाने वाली राधा है और शुकदेव जी उन्हें अपना गुरु मानते हैं। कहते हैं कि भागवत के रचयिता शुकदेव जी राधाजी के पास शुक रूप में रहकर राधा-राधा का नाम जपते थे। एक दिन राधाजी ने उनसे कहा कि हे शुक ! तुम अब राधा के स्थान पर श्रीकृष्ण ! श्रीकृष्ण ! का जाप किया करो। उसी समय श्रीकृष्ण आ गए। राधा ने यह कह कर कि यह शुक बहुत ही मीठे स्वर में बोलता है, उसे कृष्ण के हाथ सौंप दिया। अर्थात् उन्हें ब्रह्म का साक्षात्कार करा दिया। इस प्रकार श्रीराधा शुकदेव जी की गुरु हैं और वे गुरु का नाम कैसे ले सकते थे ?
“राधा प्रेम की पवित्र गहराई”

 

कृष्ण के विराट को समेटने के लिए जिस राधा ने अपने हृदय को इतना विस्तार दिया कि सारा ब्रज उसका हृदय बन गया। इसलिए कृष्ण भी पूछते हैं- बूझत श्याम कौन तू गौरी ! किन्तु राधा और राधा प्रेम की थाह पाना संभव ही नहीं। कुरूक्षेत्र में उनके आते ही समस्त परिवेश बदल जाता है। रूक्मणि गर्म दूध के साथ राधा को अपनी जलन भी देती है। कृष्ण स्मरण कर राधा उसे एक सांस में पी जाती है। रूक्मणि देखती है कि श्रीकृष्ण के पैरों में छाले हैं, मानों गर्म खोलते तेल से जल गए हों। वे पूछती हैं ये फफोले कैसे ? कृष्ण कहते हैं – हे प्रिये ! मैं राधा के हृदय में हूं। तुम्हारे मन की जिस जलन को राधा ने चुपचाप पी लिया, वही मेरे तन से फूटी है। इसलिए कहते हैं कि-

तत्वन के तत्व जगजीवन श्रीकृष्णचन्द्र और कृष्ण कौ हू तत्व वृषभानु की किशोरी है।
“श्री राधा के 32 नामों को जपने से मिलेगा प्रेम और सुख का वरदान”
श्री राधा जी के 32 नामों का स्मरण करने से जीवन में सुख, प्रेम और शांति का वरदान मिलता है. धन और संपंत्ति तो आती जाती है. जीवन में सबसे जरूरी है प्रेम और शांति. श्री राधा जी के यह नाम जीवन को शांत और सुखमयी बनाते हैँ.
श्री राधा जी के 32 नामों का स्मरण करने से जीवन में सुख, प्रेम और शांति का वरदान मिलता है. धन और संपंत्ति तो आती जाती है. जीवन में सबसे जरूरी है प्रेम और शांति. श्री राधा जी के यह नाम जीवन को शांत और सुखमयी बनाते हैं. जो भी श्रद्धापूर्वक राधा जी के नाम का आश्रय लेता है वह प्रभु की गोद मै बैठ कर उनका स्नेह पाता है. ब्रह्मवैवर्त पुराण में स्वयं श्री हरि विष्णु जी ने कहा है कि जो व्यक्ति अनजाने मैं भी राधा कहता है उसके आगे मैं सुदर्शन चक्र लेकर चलता हूं. उसके पीछे स्वयं शिव जी उनका त्रिशूल लेकर चलते हैं. उसके दाईं ओर इंद्र वज्र लेकर चलते हैं और बाईं तरफ वरुण देव छत्र लेकर चलते हैं.
1

: मृदुल भाषिणी राधा ! राधा !!

2

: सौंदर्य राषिणी राधा ! राधा !!

3 : परम् पुनीता राधा ! राधा !!

4 : नित्य नवनीता राधा ! राधा !!

5 : रास विलासिनी राधा ! राधा !!

6 : दिव्य सुवासिनी राधा ! राधा !!

7 : नवल किशोरी राधा ! राधा !!

8 : अति ही भोरी राधा ! राधा !!

9 : कंचनवर्णी राधा ! राधा !!

10 : नित्य सुखकरणी राधा ! राधा !!

11 : सुभग भामिनी राधा ! राधा !!

12 : जगत स्वामिनी राधा ! राधा !!
13 : कृष्ण आनन्दिनी राधा ! राधा !!

14 : आनंद कन्दिनी राधा ! राधा !!

15 : प्रेम मूर्ति राधा ! राधा !!

16 : रस आपूर्ति राधा ! राधा !!

17 : नवल ब्रजेश्वरी राधा ! राधा !!

18: नित्य रासेश्वरी राधा ! राधा !!

19 : कोमल अंगिनी राधा ! राधा !!

20 : कृष्ण संगिनी राधा ! राधा !!

21 : कृपा वर्षिणी राधा ! राधा !!

22: परम् हर्षिणी राधा ! राधा !!

23 : सिंधु स्वरूपा राधा ! राधा !!

24 : परम् अनूपा राधा ! राधा !!

25 : परम् हितकारी राधा ! राधा !!

26 : कृष्ण सुखकारी राधा ! राधा !!

27 : निकुंज स्वामिनी राधा ! राधा !!

28 : नवल भामिनी राधा ! राधा !!

29 : रास रासेश्वरी राधा ! राधा !!

30 : स्वयं परमेश्वरी राधा ! राधा !!

31: सकल गुणीता राधा ! राधा !!

32 : रसिकिनी पुनीता राधा ! राधा !!

कर जोरि वन्दन करूं मैं_

नित नित करूं प्रणाम_

रसना से गाती/गाता रहूं_

श्री राधा राधा नाम !!
“राधे राधे बोलने से निम्नलिखित फायदे मिलते है:–✍”
(1)राधे राधेबोलने से व्यक्ति की नेगेटिव सोच दूर हो जाती है (2) राधे राधे बोलने से व्यक्ति प्रसन्नता का अनुभव करता है (3) राधे राधे बोलने से व्यक्ति सभी धर्मों का आदर करने लगता है व भूखे को भोजन प्यासे को पानी देने के लिए प्रेरित होता है (4)राधे राधे बोलने से व्यक्ति अध्यात्मिक शक्ति व सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करता है (5) राधे राधे बोलने से आत्मा नारायण व मुरारी से संबंध और मजबूत होता है (6)राधे राधे बोलने से व्यक्ति में दूसरों का बुरा करने की इच्छा जागृत नहीं होता (7) राधे राधेबोलने से व्यक्ति अहिंसक बनता है और उसमें क्रूर स्वभाव नष्ट हो जाता है नाम एक राधे राधेफायदे अनेक….!!! रा कहत रोग सब नाशे धा कहत मिटे भाव बाधा जपिए निरन्तर श्री राधा श्री राधा श्री राधा…. 🙏🌹।।जय श्री राधे राधे जी।।🌹🙏

राधा अष्टमी का व्रत कैसे करें –

– प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त हो जाएं।

– इसके बाद मंडप के नीचे मंडल बनाकर उसके मध्यभाग में मिट्टी या तांबे का कलश स्थापित करें।

कलश पर तांबे का पात्र रखें।

– अब इस पात्र पर वस्त्राभूषण से सुसज्जित राधाजी की सोने (संभव हो तो) की मूर्ति स्थापित करें।

– तत्पश्चात राधाजी का षोडशोपचार से पूजन करें।

– ध्यान रहे कि पूजा का समय ठीक मध्याह्न का होना चाहिए।

– पूजन पश्चात पूरा उपवास करें अथवा एक समय भोजन करें।

– दूसरे दिन श्रद्धानुसार सुहागिन स्त्रियों तथा ब्राह्मणों को भोजन कराएं व उन्हें दक्षिणा दें।

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