निर्जला एकादशी ( 2 जून) पर विशेष ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहते हैं निर्जला एकादशी

निर्जला एकादशी ( 2 जून) पर विशेष ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहते हैं निर्जला एकादशी

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विजय शंकर पाण्डे / वाराणसी

निर्जला एकादशी ( 2 जून) पर विशेष
ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते हैं। वर्ष भर की चौबीस एकादशियों में से यह एकादशी सर्वोत्तम मानी गई है। हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष में चौबीस एकादशियां होती हैं। अधिकमास या मलमास में इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। इन्हीं में से एक ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता है। इस व्रत में पानी पीना वर्जित है इसिलिये इसे निर्जला एकादशी कहते हैं। मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत रखने से समूची एकादशियों के व्रतों के फल की प्राप्ति सहज ही हो जाती है। यह व्रत स्त्री और पुरुष दोनों को ही करना चाहिए।

इस व्रत को भीमसेन एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि भोजन संयम न रखने वाले पांच पाण्डवों में एक भीमसेन ने इस व्रत का पालन कर सुफल पाए थे। इसलिए इसका नाम भीमसेनी एकादशी भी पड़ा। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। यह व्रत मन को संयम सिखाता है और शरीर को नई ऊर्जा देता है। कुछ व्रती इस दिन एक भुक्त व्रत भी रखते हैं यानि सायं को दान-दर्शन के बाद फलाहार और दूध का सेवन करते हैं।

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