मेरठ: सरकारों के खिलाफ आंदोलन रहे महेंद्र सिंह टिकैत की पहचान

मेरठ: सरकारों के खिलाफ आंदोलन रहे महेंद्र सिंह टिकैत की पहचान

किसानों के मसीहा महेंद्र सिंह टिकैत की जयंती पर विशेष 
वीर बहादुर सिंह को पड़ा था झुकना !
वीपी सिंह भी लौटे थे कभी मायूस !

खालिद इक़बाल/सनसनी सुराग

मेरठ। किसान नेता और भारतीय किसान यूनियन के संस्थापक महेंद्र सिंह टिकैत का जन्म 06 अक्टूबर 1935 को मुजफ्फरनगर जिले के सिसौली गांव में में हुआ था। वह जाट समुदाय के रघुवंशी गोत्र के थे और बालियान खाप के चौधरी भी थे। किसानों की मांगों को लेकर राज्य व केंद्र सरकार के विरुद्ध आंदोलन महेंद्र सिंह टिकैत की पहचान रही है। हरे रंग का झंडा और लाल टोपी भारतीय किसान यूनियन का प्रतीक था। महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में 25 अक्टूबर 1988 से दिल्ली के वोट क्लब पर लाखों की संख्या में सात दिन तक जमे रहे थे और किसानों ने केंद्र सरकार को गन्ना के समर्थन मूल्य, कृषि हेतु विद्युत-पानी की दर को कम करने के 35-सूत्री मांगों पर झुकने को मजबूर कर दिया था।
जनवरी 1987 में जब बिजली दरों में प्रति हार्स पावर बीस रुपये की बढ़ोत्तरी की गई, तब महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में भारी संख्या में किसानों ने मुजफ्फरनगर के करमूखेड़ा बिजलीघर को घेर लिया था। आठ दिनों तक उनकी घेरेबंदी चलती रही थी और घेरा तब टूटा जब तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह ने फैसला वापस लेने का एलान कर दिया था। वर्ष 1988 में भी उन्होंने मेरठ कमिश्नरी में कई दिनों तक प्रदर्शन किया था और इसके समानांतर मुरादाबाद के रजबपुर में भी 110 दिनों तक किसानों द्वारा घेराव किया गया था। जून 1990 में महेंद्र सिंह टिकैत का आंदोलन लखनऊ की ओर मुड़ा, लेकिन राज्य सरकार ने उन्हें फैजाबाद में गिरफ्तार कराकर आंदोलन दबाने की कोशिश की थी। इससे किसान भड़क गए और उत्तर प्रदेश में सात दिनों तक किसानों के जेल भरने का सिलसिला चला, तो एक बार फिर राज्य सरकार को झुकना पड़ा था। जुलाई 1992 में गन्ना मूल्य भुगतान, बिजली कर्ज माफी आदि मांगों को लेकर जब दोबारा उन्होंने लखनऊ कूच किया तो राज्य सरकार ने उन्हें मेरठ में ही गिरफ्तार करा लिया था। मार्च 2001 को किसान घाट, जुलाई 2001 को जंतर-मंतर और 2007 में वोट क्लब पर महेंद्र सिंह टिकैत ने भारतीय किसान यूनियन के तहत आंदोलन किया था। महेंद्र सिंह टिकैत ने किसान आंदोलन मंच से कभी राजनीतिक लोगों को लाभ नहीं उठाने दिया। जिसका मजबूत उदहारण यह बताया जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह भी उनके मंच से मायूस होकर लौटना पड़ा था।

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