महाभारत का कारण श्रीकृष्ण स्वयं बनना चाहते थे

महाभारत का कारण श्रीकृष्ण स्वयं बनना चाहते थे

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एक सुनी सुनाई कहानी पर मैं आज तक विश्वास करता रहा कि द्रौपदी के कारण महाभारत हुआ क्योंकि उसने खुलकर दुर्योधन का उपहास किया और साथ में यह भी कहा कि अंधे की औलाद भी अंधी , लेकिन यह तथ्य सही नहीं है I

हस्तिनापुर में जब पांडवों ने अश्वमेध यज्ञ किया तो कौरव कुल के सभी बन्धु-बान्धवों ,अपने फुफेरे भाई श्रीकृष्ण को सपरिवार बुलाने के अलावा अन्य इष्ट मित्रो और अनेक अथिति राजाओं- महाराजों को भी आमंत्रित किया I कौरवों के मन से दुर्भावना मिटाने के उद्देश्य से ही युद्धिष्ठिर ने दुर्योधन को यज्ञ का पूरा फाइनेंसियल मैनेजमेंट थमा दिया फिर भी दुर्योधन संतुष्ट नहीं हुआ I आयोजन बहुत सफल रहा तो दुर्योधन के मन में भयंकर ईर्ष्या और डाह पनपने लगी ,वह बात- बात पर क्रोधित होने लगा I

यज्ञ की समाप्ति के दिन जब युद्धिष्ठिर अपने राज दरवार में इंद्र के साथ विराजमान थे और अन्य गण्यमान्य अतिथि और परिवारजन भी कृष्ण के साथ उपस्थित थे, दुर्योधन खुली तलवार लेकर द्वारपालों को डांटा हुआ सभा मंडप में प्रवेश कर रहा था कि उसको सभा भवन का फर्श कुछ अलग तरह का दिखाई दिया , जहां तो सूखा था वहाँ दुर्योधन ने अपने कपडे ऊपर समेटते लिये और जहाँ जल था वहां वह सूखा समझकर छपाक से पानी में गिर पड़ा -अब ऐसे समय में कोई अपनी हंसी कैसे रोक सकता था भला ? फिर भी युद्धिष्ठिर ने अपने भाइयों को हंसने से रोका लेकिन युद्धिष्ठिर के पीछेे श्रीकृष्ण खड़े थे उन्होंने भीम आदि की ओर इशारा किया कि खूब हंसो और वह खुद भी इस हंसी में शामिल हो गये I

यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि गुस्से में और ईर्ष्या में आदमी को कुछ दिखाई नहीं देता ,वह कुछ समझता है और कुछ कर बैठता है ,दुर्योधन के साथ भी यही हुआ -क्रोधात भवति सम्मोह : सम्मोहात स्मृति विभ्रमः | स्मृति भ्रन्शात बुद्धि- नाश : बुद्धि – नाशयात प्रणश्यति ||

दुर्योधन मन में यही अपमान की आग जीवन पर्यन्त जलती रही और वह पांडवों के प्रति प्रतिशोध लेने के हर संभव मौके तलाशता रहा I दूसरी बात यह थी कि वह jilted lover था I वह कभी यह नहीं पचा सका की द्रौपदी जैसी अत्यंत सुंदरी और विदुषी स्त्री पांडवों की पत्नी क्यों और कैसे हो गई ,उसके प्रति उसका प्रेम ईर्ष्या की हद तक असीमित था I तो दूसरे शब्दों में कहें तो महाभारत का कारन द्रौपदी नहीं बल्कि श्रीकृष्ण स्वयं बनना चाहते थे |
यह प्रकरण श्रीमदभागवत के दशम स्कंध के ७५ वें अध्याय में वर्णित है |

  • साभार – गोविन्द प्रसाद बहुगुणा की फेसबुक वाल से

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