क्रांतिकारी देशभक्त खुदीराम बोस की साहसिक जीवन गाथा, खुदीराम बोस की जयंती पर विशेष लेख

क्रांतिकारी देशभक्त खुदीराम बोस की साहसिक जीवन गाथा, खुदीराम बोस की जयंती पर विशेष लेख

- in Other Updates
77
0

सनसनी सुराग न्यूज
अनुराग गुप्ता/डॉ0 रणवीर सिंह वर्मा

क्रांतिकारी देशभक्त खुदीराम बोस की साहसिक जीवनगाथा——-
वैसे तो देश को आजाद कराने के लिए लाखों वीरों ने हंसते- हंसते अपनी जान देश के खातिर कुर्बान कर दी थी। जिनमें भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद सरीखे नाम हमारे जहन में आते हैं। लेकिन इस सब की तरह ही एक नौजवान बालक जोकि अपने बचपन की दहलीज से बाहर निकला ही था कि देश के लिए फांसी के तख्ते पर झूल गया।

हम बात कर रहे हैं अमर शहीद खुदीराम बोस की। जिस उम्र में उनके साथ के लोग हाथों में किताबें लेकर पढ़ाई कर रहे थे और परीक्षा के बारे में सोच रहे थे, उस दौरान खुदीराम अपने देश के लिए क्रांति की मशाल रौशन कर रहे थे। इतनी कम उम्र में उन्होंने शहादत का दीप जलाया था। खुदीराम की बहादुरी और देशभक्ति को आज भी देश नमन करता है।

11 अगस्त, 1908 को ब्रिटिश सरकार ने सिर्फ 18 साल की उम्र में उन्हें फांसी पर लटका दिया था। खुदीराम खुद तो शहीद हो गए लेकिन देश में क्रांति की मशाल जगा गए। उनके जाने के बाद देश मे स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी जलने लगी।

खुदीराम का जन्म 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी नामक गांव में बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस के यहां हुआ था. उनकी माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था. बालक खुदीराम के मन में देश को आजाद कराने की
ऐसी लगन लगी कि नौवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और मुक्ति आंदोलन में कूद पड़े.
स्कूल छोड़ने के बाद खुदीराम रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और वन्दे मातरम् पैंफलेट वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 1905 में बंगाल के
विभाजन के विरोध में चलाए गए आंदोलन में उन्होंने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया.

वह ब्रिटिश सरकार के खिलाफ खुलकर नारेबाजी और आंदोलन शुरु करने लगे थे। उन्होंने सत्येन बोस के नेतृत्व में अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया था। इसके बाद वह रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने। खुदीराम ने लोगों को पर्चे बांटना शुरु कर दिया था। जिस पर वंदेमातरम् लिखा होता था।
फरवरी १९०६ में मिदनापुर में एक औद्योगिक तथा कृषि प्रदर्शनी लगी हुई थी। प्रदर्शनी देखने के लिये आसपास के प्रान्तों से सैंकडों लोग आने लगे। बंगाल के एक क्रांतिकारी सत्येंद्रनाथ द्वारा लिखे ‘सोनार बांगला’ नामक ज्वलंत पत्रक की प्रतियाँ खुदीरामने इस प्रदर्शनी में बाँटी। एक पुलिस वाला उन्हें पकडने के लिये भागा। खुदीराम ने इस सिपाही के मुँह पर घूँसा मारा और शेष पत्रक बगल में दबाकर भाग गये। इस प्रकरण में राजद्रोह के आरोप में सरकार ने उन पर अभियोग चलाया परन्तु गवाही न मिलने से खुदीराम निर्दोष छूट गये।

२८ फरवरी १९०६ को खुदीराम बोस गिरफ्तार कर लिये गये लेकिन वह कैद से भाग निकले। लगभग दो महीने बाद अप्रैल में वह फिर से पकड़े गये। १६ मई १९०६ को उन्हें रिहा कर दिया गया।

६ दिसंबर १९०७ को खुदीराम ने नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया परन्तु गवर्नर बच गया। सन १९०८ में उन्होंने दो अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया लेकिन वे भी बच निकले।

मिदनापुर में ‘युगांतर’ नाम की क्रांतिकारियों की गुप्त संस्था के माध्यम से खुदीराम क्रांतिकार्य पहले ही में जुट चुके थे। १९०५ में लॉर्ड कर्जन ने जब बंगाल का विभाजन किया तो उसके विरोध में सडकों पर उतरे अनेकों भारतीयों को उस समय के कलकत्ता के मॅजिस्ट्रेट किंग्जफोर्ड ने क्रूर दण्ड दिया। अन्य मामलों में भी उसने क्रान्तिकारियों को बहुत कष्ट दिया था। इसके परिणामस्वरूप किंग्जफोर्ड को पदोन्नति देकर मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश के पद पर भेजा। ‘युगान्तर’ समिति कि एक गुप्त बैठक में किंग्जफोर्ड को ही मारने का निश्चय हुआ। इस कार्य हेतु खुदीराम तथा प्रफुल्लकुमार चाकी का चयन किया गया। खुदीरामको एक बम और पिस्तौल दी गयी। प्रफुल्लकुमार को भी एक पिस्तौल दी गयी। मुजफ्फरपुर में आने पर इन दोनों ने सबसे पहले किंग्जफोर्ड के बँगले की निगरानी की। उन्होंने उसकी बग्घी तथा उसके घोडे का रंग देख लिया। खुदीराम तो किंग्जफोर्ड को उसके कार्यालय में जाकर ठीक से देख भी आए।

३० अप्रैल १९०८ को ये दोनों नियोजित काम के लिये बाहर निकले और किंग्जफोर्ड के बँगले के बाहर घोडागाडी से उसके आने की राह देखने लगे। बँगले की निगरानी हेतु वहाँ मौजूद पुलिस के गुप्तचरों ने उन्हें हटाना भी चाहा परन्तु वे दोनाँ उन्हें योग्य उत्तर देकर वहीं रुके रहे। रात में साढे आठ बजे के आसपास क्लब से किंग्जफोर्ड की बग्घी के समान दिखने वाली गाडी आते हुए देखकर खुदीराम गाडी के पीछे भागने लगे। रास्ते में बहुत ही अँधेरा था। गाडी किंग्जफोर्ड के बँगले के सामने आते ही खुदीराम ने अँधेरे में ही आगे वाली बग्घी पर निशाना लगाकर जोर से बम फेंका। हिन्दुस्तान में इस पहले बम विस्फोट की आवाज उस रात तीन मील तक सुनाई दी और कुछ दिनों बाद तो उसकी आवाज इंग्लैंड तथा योरोप में भी सुनी गयी जब वहाँ इस घटना की खबर ने तहलका मचा दिया। यूँ तो खुदीराम ने किंग्जफोर्ड की गाडी समझकर बम फेंका था परन्तु उस दिन किंग्जफोर्ड थोडी देर से क्लब से बाहर आने के कारण बच गया। दैवयोग से गाडियाँ एक जैसी होने के कारण दो यूरोपियन स्त्रियों को अपने प्राण गँवाने पडे। खुदीराम तथा प्रफुल्लकुमार दोनों ही रातों – रात नंगे पैर भागते हुए गये और २४ मील दूर स्थित वैनी रेलवे स्टेशन पर जाकर ही विश्राम किया।

अंग्रेज पुलिस उनके पीछे लग गयी और वैनी रेलवे स्टेशन पर उन्हें घेर लिया। अपने को पुलिस से घिरा देख प्रफुल्लकुमार चाकी ने खुद को गोली मारकर अपनी शहादत दे दी जबकि खुदीराम पकड़े गये।

खुदीराम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इस गिरफ्तारी का अन्त निश्चित ही था। किंग्जफोर्ड ने घबराकर नौकरी छोड दी और जिन क्रांतिकारियों को उसने कष्ट दिया था उनके भय से उसकी शीघ्र ही मौत भी हो गयी।

फाँसी के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गये कि बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे। इतिहासवेत्ता शिरोल के अनुसार बंगाल के राष्ट्रवादियों के लिये वह वीर शहीद और अनुकरणीय हो गया। विद्यार्थियों तथा अन्य लोगों ने शोक मनाया। कई दिन तक स्कूल कालेज सभी बन्द रहे और नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे, जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था।

मुज़फ्फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने उन्हें फाँसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फाँसी के तख़्ते की ओर बढ़ा था।

उनकी शहादत से समूचे देश में देशभक्ति की लहर उमड़ पड़ी थी। उनके साहसिक योगदान को अमर करने के लिए गीत रचे गए और उनका बलिदान लोकगीतों के रूप में मुखरित हुआ। उनके सम्मान में भावपूर्ण गीतों की रचना हुई जिन्हें बंगाल के लोक गायक आज भी गाते हैं।

. 8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। जब जज ने फैसला पढ़कर सुनाया तो खुदीराम बोस मुस्कुरा दिए। जज को ऐसा लगा कि खुदीराम सजा को समझ नहीं पाए हैं, इसलिए मुस्कुरा रहे हैं।

कन्फ्यूज होकर जज ने पूछा कि क्या तुम्हें सजा के बारे में पूरी बात समझ आ गई है। इस पर बोस ने दृढ़ता से जज को ऐसा जवाब दिया जिसे सुनकर जज भी स्तब्ध रह गया। उन्होंने कहा कि न सिर्फ उनको सिर्फ फैसला पूरी तरह समझ में आ गया है, बल्कि समय मिला तो वह जज को बम बनाना भी सिखा देंगे
11 अगस्त 1908 को सुबह 6 बजे महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस को फांसी के फंदे पर झुलाया जाना था। 10 अगस्त की रात को उनके पास जेलर पहुंचा। जेलर को खुदीराम से पुत्रवत स्नेह हो गया था। वह अपने साथ 4 रसीले आम लेकर उनके पास पहुंचा और बोला, ‘‘खुदीराम, ये आम मैं तुम्हारे लिए लाया हूं। तुम इन्हें चूस लो। मेरा एक छोटा-सा उपहार स्वीकार करो। मुझे बड़ा संतोष होगा।’’
सुबह जेलर फांसी के लिए खुदीराम को लेने पहुंचा। वह पहले से ही तैयार थे। जेलर ने देखा कि उसके द्वारा दिए गए आम वैसे के वैसे रखे हुए हैं। उसने पूछा, ‘‘क्यों खुदी राम! तुमने ये आम चूसे नहीं? तुमने

मेरा उपहार स्वीकार क्यों नहीं किया?’’

खुदीराम ने बहुत भोलेपन से उत्तर दिया, ‘‘अरे जेलर साहब! जरा सोचिए, सुबह ही जिसको फांसी के फंदे पर झूलना हो, क्या उसे खाना-पीना सुहाएगा?’’
जेलर ने कहा, ‘‘खैर, कोई बात नहीं, मैं ये आम उठा लेता हूं और अब इन्हें तुम्हारा उपहार समझकर मैं चूस लूंगा।’’

यह कह कर जेलर ने जैसे ही आमों को उठाना चाहा, वे पिचक गए। खुदीराम जोर से ठहाका मारकर हंसे और काफी देर तक हंसते रहे। उन्होंने उन आमों का रस रात में ही चूस लिया था और उन्हें फुलाकर रख दिया था।

जेलर खुदीराम की मस्ती पर मुग्ध और आश्चर्यचकित हुए बिना न रह सका। वह सोच रहा था कि कुछ समय बाद मृत्यु जिसको अपना ग्रास बना लेगी, वह अट्टहास कर किस प्रकार मृत्यु की उपेक्षा कर रहा है। जेलर ने कहा, ‘‘वास्तव में यह मातृभूमि रत्नगर्भा है और खुदीराम जैसे लोग इस मातृभूमि के रत्न हैं। ऐसे महापुरुष बार-बार हमारी मातृभूमि पर अवतरण लें, ऐसी मंगल कामना है

loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may also like

किसानों की फसलों के दाम न बढाये जाने के विरोध मे करनाल हाईवे दो घंटे जाम

तसलीम आलम झिंझाना 11 दिसम्बर : प्रदेश सरकार