अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य मे विशेष…

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य मे विशेष…

डॉ0 रणवीर सिंह वर्मा
ब्यूरो चीफ
सनसनी सुराग न्यूज
जनपद शामली (उ0 प्र0)

 

🙏🏻🚩🌹तत्व ज्ञान🌹🚩
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य मे

*🙏🏻योग है क्या?🙏🏻*
*पुज्यतेsसौ योग:* अर्थआत जिसके द्वारा मिलन होता है, वह योग है! व्युत्पति की दृष्टि से भी देखे, तो योग शब्द संस्कृत की युज धातु से बना है जिसका अर्थ होता है- ‘जुड़ना’! अँग्रेजी भाषा का yoke शब्द भी युज धातु से ही बना है, जिसका अर्थ होता है ‘to unite ‘! किससे जुड़ना? यहाँ आत्मा की परमात्मा से जुड़ने की बात कही गई है! चार वेदो के चार महावाक्य- *प्रज्ञानम ब्रह्म*(एतरेयोपनिषद: ऋग्वेद: 3/3), *अयं आत्मा ब्रह्म* (माणडूक्योपनिषद: अथर्ववेद: 1/2) *तत त्वं असि* (छान्दोग्योपनिषद: सामवेद: 6/7/8) तथा *अहम ब्रह्मास्मि* (बृहदारणयक उपनिषद: यजुर्वेद: 1/4/10) भी आत्मा और परमात्मा के इसी संयोग के संकेतक है! बौद्ध योग, वेदान्त योग, जैन योग, सांख्य योग, ताओ योग, तिब्बती योग, चीनी योग, जापानी या जेन(zen) योग, महऋषि अरविंद द्वारा प्रतिपादित पूर्ण योग(Integral yoga), योगानंद परमहंस द्वारा प्रतिपादित क्रिया योग इत्यादि इसी योग के विश्व व्यापक रुप है!
कहते है कि भारत के आचार्य हिरणयगर्भ योग के आदि प्रवर्तक है! आचार्य हिरणयगर्भ के इसी योग को महऋषि पतंजलि ने संकलित किया और जनसाधारण के लिए सुलभ किया! तब से यह पातंजल योगदर्शन के नाम से प्रचलित हो गया! महऋषि पतंजलि ने योगदर्शन के द्वितीय श्लोक मे ही योग को परिभाषीत करते हुए लिखा- *’योग: चित व्रति निरोध:’* अर्थआत चित व्रतियो का निरुद्ध(अर्थआत स्थिर) होना ही योग है!
योग की यह परिभाषा वेद सहित कई प्राचीन ग्रंथो मे अंकित है! कठोपनिषद(2/3/11) मे महापुरुषो ने कहा- *’तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रिय धारणाम’* अर्थआत इंद्रिय, मन और बुद्धि की स्थिर धारणा का नाम ही योग है! श्रीमदभगवद गीता मे भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं योग को परिभाषीत किया-
*यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता!*
*योगिनो यतचितस्य युनजतो योगमात्मन:!!*
*अर्थआत जिस अवस्था मे मनुष्य का चित परमात्मा मे इस प्रकार स्थित हो जाता है जैसे वायुरहित स्थान मे दीपक होता है, उस अवस्था को योग कहते है!*
सारत: योग एक एसी अवस्था है, जिसमे चित का आत्मा मे लय हो जाता है और तदनंतर आत्मा और परमात्मा का मिलन संभव होता है! अब प्रश्न उठता है कि चित की एसी अवस्था कैसे हो? और क्या आज भी यह संभव है? Mircea Eliade ने अपनी पुस्तक ‘Yoga-Immortality & Freedom ‘ मे योग को living fossil कहा! अर्थआत योग भारत का एक एसा संरक्षित ज्ञान है, जो आज भी जीवंत रुप मे हमारे जीवन का व्यवहार बन सकता है! परंतु योग को समझने के लिए सर्वप्रथम समझना होगा कि ‘चित’ क्या है?

🙏🏻🚩योग: चित व्रति निरोध:
*🙏🏻चित क्या है?🙏🏻*
भौतिक विज्ञान मनुष्य की हडडियो, माँस, मज्जा, रक्त आदि का संयोजन मानता है! परंतु आध्यात्मिक विज्ञान मनुष्य के सथूल शरीर से परे सूक्ष्म व कारण शरीर के अस्तित्व मे भी विश्वास करता है! उनमे आत्मा तथा अंत:करण की प्रबल भूमिका है! आत्मा अर्थआत परमात्मा का अंश जो जीवन का आधार है! आत्मा और सथूल शरीर का सम्बन्ध अंत:करण के द्वारा है! अंत:करण के चार मुख्य विभाग है- मन, बुद्धि, चित और अहंकार! मन यानी विचारो का प्रवाह; बुद्धि यानी सोचने व निर्णय लेने की क्षमता; अहंकार यानी आत्मा और परमात्मा के मध्य भेद उत्पन्न करने वाला अज्ञान!
इनके अतिरिक्त ‘चित’ एक एसा पटल है, जो सथूल इन्द्रियो से लेकर सूक्ष्म मन व बुद्धि की समस्त प्रक्रियाओ का साक्षी है! स्वामी विवेकानंद ने योग सूत्रो पर जो भाष्य लिखे, उसमे चित की तुलना झील से की है! झील के तले को आत्मा कहा! झील मे बाहर से डाले जा रहे पतथर-कंकडो को इन्द्रियो, मन व बुद्धि द्वारा पहुँचाए गए विषय-प्रतिबिम्ब कहा! जब हम झील मे पतथर-कंकड़ आदि डालते है, तो उसकी सतह पर तरंगो का व्रत आ जाता है! अभी तक जो जल स्थिर होने के कारण पारदर्शी था या कहे उसका अस्तित्व अनस्तित्व के समान था, जिसके फलस्वरुप झील मे झील के तले की छवि का ही रूप व्यापक था, अब वह जल अशांत हो उठता है! अपनी पारदर्शीता भी खो बैठता है! ठीक इसी प्रकार मनुष्य का चित भी इन्द्रियो, मन व बुद्धि की उतेजनाओ के कारण अशांत रहता है! मनुष्य के चित मे उठने वाली इन उतेजनाओ को महऋषि पतंजलि ने व्रतियाँ कहा! जब तक चित मे व्रतियाँ उछलती है, चित अशांत ही रहेगा! चित का आत्मा मे लय संभव नही हो पाएगा!
अब आगे की बात समझते है! जब हम झील मे पतथर या कंकड़ डालते है, तो एक तो उसकी सतह पर लहरो के भंवर के रूप मे व्रत जन्म लेते है! दूसरा, वह पतथर अथवा कंकड़ यदि भारी है, तो झील के तल तक जा वही बैठ जाता है! ठीक इसी प्रकार मनुष्य के चित पर भी प्रत्येक उतेजना दो प्रकार से कार्य करती है! मान लीजिए, किसी ने आपका अपमान किया! आपने भी बदले मे उन पर क्रोध कर दिया! लेकिन क्रोध रूपी कर्म करने के कारण आपके और उनके मध्य एक द्वेष का संस्कार बन गया! अब वह कही व्यक्त तो नही हुआ, परंतु आपके चित की गहराई मे जाकर बस गया! व्रति के रूप मे अपना घर बना लिया! अगली बार, जब कभी वह व्यक्ति आपके सामने आएगा तो उसकी सामान्य बात पर भी आपके भीतर उसके लिए द्वेष जन्म ले लेगा! चित रुपी झील मे उठने वाली ये अनंत व्रतियो रूपी लहरे चित की अस्थिरता एवं अशुद्धि का कारण है!
शुद्ध चित एवं अशुद्ध चित मे उतना ही अंतर होता है! जितना काँच(clear glass) और आइने(mirror) मे! यदि आइने के पीछे से रंग की परत को हटा दिया जाएं, तो वही आइना काँच सा पारदर्शी बन जाता है! ठीक इसी प्रकार मनुष्य का चित अशुद्ध है, जिसमे जन्मो-जन्म के कर्म-संस्कारो के कारण असंख्य व्रतियो की परत जम चुकी है! इसलिए चित ने अपनी वास्तविक शुद्ध अवस्था खो दी है! यही कारण है कि मनुष्य का चित एक आइने की ही भाँति उसके व्यक्तित्व का परावर्तक(reflector) बन जाता है! लेकिन चित की व्रतियो के विक्षेप को हटाकर अर्थआत व्रतियो का निरोध करके इसे भी पारदर्शी अर्थआत स्थिर किया जा सकता है! एसी स्थिर अवस्था मे किसी भी बाहरी क्रिया पर चित प्रतिक्रिया विहीन रहता है! समस्त बाहरी उतेजनाएं काँच की भाँति चित से आर-पार हो जाती है!
योग: चित व्रति निरोध:
बात मुक्ति की हो, आध्यात्मिक उन्नति की हो, आनंद की चिरंतन अनुभूति की हो, दु:ख-विषाद के अहसास से उपर उठने की हो या फ़िर मनुष्य के संपूर्ण स्वास्थय की ही क्यों न हो; ‘योग’ एक एसा छत्र है जिसमे ये सब लाभ समाए हुए है! यूनेस्को(संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन) के अनुसार योग शरीर, मन व आत्मा के समन्वय पर आधारित एक एसी पद्धति है, जो शारीरिक, मानसिक व आत्मिक उतथान की कारक तो है ही, साथ ही सामाजिक विकास का भी अभिन्न अंग है! इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations) द्वारा घोषीत किया गया कि हर वर्ष ’21 जून’ अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रुप मे मनाया जाएगा!
सन 2016 मे यूनेस्को ने योग को मानवता की अप्रत्यक्ष सांस्कृतिक धरोहर (Intangible Cultural Heritage of Humanity) की प्रतिनिधित्व सूची मे भी दर्ज किया!
भारतीय षडदर्शनो मे से एक दर्शन है- *योगदर्शन!* योग दर्शन ही केवल एक एसा दर्शन है, जिसमे अध्यात्म के प्रयोगात्मक पक्ष का वर्णन किया गया है! इसी कारण यह दर्शन काफ़ी विख्यात हुआ! हालांकि पूर्वी देशो मे विख्यात इस प्राचीन योग का अनुसरण पाश्चात्य देशो मे बीसवी सदी मे ही शुरू हुआ! इस पर भी विडम्बना यह रही कि आज तक विश्व के अधिकांश स्थानो पर योग को शारीरीक व्यायाम व श्वास क्रिया के संयम तक ही सीमित माना जाता है!
*जिस अवस्था मे मनुष्य का चित परमात्मा मे इस प्रकार स्थित हो जाता है जैसे वायुरहित स्थान मे दीपक होता है, उस अवस्था को योग कहते है!*
*(साध्वी दीपीका भारती)*

*www.divyajyoti.org*

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