उत्त्तरकाशी : मूलभूत सुविधाओं को तरसता राजकीय इंटर कालेज डुंडा

उत्त्तरकाशी : मूलभूत सुविधाओं को तरसता राजकीय इंटर कालेज डुंडा

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  • रिपोर्टर /वीरेन्द्र सिँह /सनसनी सुराग

उत्तरकाशी जिले  एक ऐसे स्कूल की जो आधुनिक भारत  की हकीकत को बंया करता रहा है जी हाँ तस्वीरों में आप देख रहे हैं डुंडा ब्लॉक के राजकीय इंटर कालेज का भवन ।

शासन ने राजकीय इंटर कालेज का नाम तो बदल दिया । मगर स्कूल को सुविधाए नही दे पा रही है । स्कूल मे 300-400 छात्र -छात्राएं पढ़ने आते है । उनके लिऐ सुविधाएं उपलब्ध नही है स्कूल में । मार्च में विद्यार्थिओं के पेपर होने वाले हें। और विद्यार्थिओं के लिऐ बेंच कि व्यवस्था उपलब्ध नही है ।
शिक्षा महकमें के अफसरों की लापरवाही से देश का आने वाले भविष्य नन्हें मुन्हे बच्चों  के जीवन पर भारी पड़ रहा है।

मुख्यालय से महज मात्र 16किमी दूर डुंड़ा ब्लॉक का राजकीय इंटर कालेज   की टूटी- फूटी दीवारों और छत पर सड़ी- गली  बल्लियों के सहारे चल रहा लेकिन जिम्मेदार अफसर इस ओर कोई  ध्यान नहीं दे रहा है डुंडा ब्लॉक में वर्ष 1960 में राजकीय इंटर कालेज खोला गया था लेकिन 68 वर्ष का समय पूरा होने पर भी  अब तक इस विद्यालय में  न तो कोई मरम्मत का कार्य किया गया है  और न ही कोई नया भवन का निर्माण कार्य किया गया है

68 वर्षों से संचालित इस विद्यालय में विद्यालय का अपना भवन पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त हो गया है लेकिन 1960से अब तक डुंड़ा ब्लाक के इस विद्यालय में छात्र जैसे तैसे शिक्षा ग्रहण कर रहे है लेकिन कुछ वर्षों  विद्यालय भवन की स्थिति इतनी गम्भीर व दयनीय बनी हुई है कि  विद्यालय भवन को अब बल्लियों के सहारे खड़ा रखा हुआ है इस जर्जर हालत वाले  विद्यालय में पड़ने वाले छात्रों का भी  पढ़ाई में पूरी तरह ध्यान लगाना  मुश्किल हो गया है  साथ ही अध्यापकों को भी पढ़ाने में भय बना रहता है छात्रों के साथ -साथ अभिभावकों को भी अपने बच्चों के प्रति भय का माहौल बना रहता है । लेकिन इन छात्रों का दुर्भाग्य तो देखों जंहा सूबे के शिक्षा मंत्री हाई टेक शिक्षा प्रणाली की बात करते हैं वही उनके वादों को आइना दिखा रही डुंड़ा ब्लॉक के राजकीय इंटर कालेज की टूटी हुई छत के नीचे  शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर है ।

शिक्षा विभाग की लापरवाही से गंगा घाटी के ऐसे अनेकों स्कूलों में देखने को मिलता है गरीब परिवार के बच्चों ऐसी छतिग्रस्त भवनों में अपनी शिक्षा पूरी करने को मजबूर हैं

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