यह तन विश की बेलरी, गुरू अमृत की खान, शीश दियो सद गुरू मिले, तो भी सस्ती जान ।

यह तन विश की बेलरी, गुरू अमृत की खान, शीश दियो सद गुरू मिले, तो भी सस्ती जान ।

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सनसनी सुराग न्यूज
डॉ0 रणवीर सिंह वर्मा

गुरू की खोज हम जितनी सरल और सहज समझते है उतनी है नही । आम आदमी शिक्षक को ही गुरू समझने की भूल करते है । गुरू जो ज्ञान दे,
शिक्षक जो शिक्षा दे । ज्ञान अंदर की विषय वस्तु है
जबकि शिक्षा बहार की । गुरू चेतना को जागृत करता है जबकि शिक्षक जानकारी मात्र देता है ।
शिक्षक केवल एक पंडित है, शिक्षक एक होज है ।
गुरू कुआँ है, होज में कोई झरना नही होता कुएं में
झरना होता है और यह सागर से जुडा होता है । गुरू की पहचान प्रेम की उमंग से जुडी होती है । जिस व्यक्ति के पास बैठकर तुम्हारे भीतर आनंद का भाव भर जाये, शांती की एक लहर दौड जाये,
एक सन्नाटा खिच जाये, कोई चीज तुम्हारे हृदय को छू जाये, तुम्हारा तालमेल बैठ जाये, सांसे किसी के साथ चलने लगे, हृदय किसी के साथ धड़कने लगे जैसा प्रेम मे होता है वैसा ही सद गुरू मिलने पर होता है । गुरू का मिलना बड़ा प्रेम है, यह प्रेम की पराकाष्ठा है । गुरू कोपहचानने का अर्थ हुआ की तुम शिष्य बन गये । शिष्य बन गये अर्थात आधा काम पूरा हो गया ।
जिसने दूसरे के लिखे शास्त्रो, कथनो को केवल कण्ठ्स्थ किया है और इसकी सूचना मात्र अपने छात्रो को देता है वह शिक्षक है । शिक्षक जिसने पढा, गुरू जिसने जाना ।
शिक्षक आपको कुछ देता है, गुरू आपसे कुछ छीनता है । शिक्षक आपको भरता है, गुरू आपको खाली करता है, गुरू अहंकार को छीन लेता है ।
शिक्षक आजीविका देता है, गुरू जीवन देता है । गुरू आपको मिटा देता है और जब आप वापस लौटते है तो आपका पुनर्जन्म हो गया होता है । इसलिये एक गर्भ माँ का और दूसरा गुरू का होता है । शिक्षक आये दिन बदलते रहते है जबकि गुरू एक बार ही मिलना दुर्लभ है । शिक्षक का सम्बंध पैसे से है, गुरू का सम्बंध प्रेम से हैं । गुरू शिष्य के बीच जो प्रेम घटित होता है वह संसार मे सबसे पवित्र प्रेम है । गुरू का सम्मान गुरू पूर्णिमा के दिन
श्रधा के साथ बडे प्रेम भाव से किया जाता है ।
जिज्ञासू होना शिष्य की पहली पात्रता है । शिष्य अगर जिज्ञासू नही है तो गुरू बृहस्पति तक कुछ नही कर सकते । गुरू मिलने के लिए एक अनिवार्य
शर्त है जो झुकने को राजी है उन्हे गुरू मिल ही जाते है ।

आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते है !इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है !
इसी दिन भगवान व्यास का जन्म हुआ था !

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरु: साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर, विश्व के समस्त गुरुजनों को मेरा शत् शत् नमन। गुरु के महत्व को हमारे सभी संतो, ऋषियों एवं महान विभूतियों ने उच्च स्थान दिया है। *संस्कृत में ‘गु’ का अर्थ होता है अंधकार (अज्ञान)एवं ‘रु’ का अर्थ होता है प्रकाश(ज्ञान)। गुरु हमें अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं।….

तुम्हारी शपथ हम निरंतर तुम्हारे,
चरण चिन्ह की राह चलते रहेंगे,
करेंगे हर एक स्वप्न पूरा तुम्हारा,
उसी यतन में पग मचलते रहेंगे.

 

🙏गूरूपूर्णिमा की शुभकामनाएं🙏

राकेश सैनी

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