जीरो टॉलरेन्स : डॉक्टर आते नहीं, इंजीनियर जाते नहीं

जीरो टॉलरेन्स : डॉक्टर आते नहीं, इंजीनियर जाते नहीं

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  • संतोष साह / उत्तरकाशी

जिले मे डॉक्टर्स की कमी है। डॉक्टर के अधिकांश पद खाली होने से इसका प्रभाव स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। ऐसा नहीं कि पहाड़ में सरकार डॉक्टर न भेजती हो लेकिन इसे पहाड़ का दुर्भाग्य कहें या फिर डॉक्टरी पेशा की यहां अधिकांश चिकित्सक आम तौर पर अपनी सेवाएं देने आते ही नहीं और अधिकांश डॉक्टर जो आ भी जाते हैं तो उनमें से कई डॉक्टर पहाड़ मे टिकने को राजी नहीं होते।

उदाहरण एक दफा भुवन चंद्र खंडूरी की सरकार ने 15 हजार मे एमबीबीएस की डिग्री देकर जिन्हें डॉक्टर बनाया था वे तक पहाड़ नहीं चढे जबकि मकसद साफ था कि बहुत कम पैसे मे डॉक्टरी करा कर कम से कम पहाड़ में डॉक्टर पक्का जाएंगे लेकिन यह प्रयोग भी डॉक्टरी मे काम नही आया। अब सवाल की जब 15 हजार मे डाक्टर की डिग्री लेने वाला तब पहाड़ चढ़ने को राजी नही हुआ तो भला लाखों ख़र्च करने वाले को कैसे मनाया जा सकता है।

इसके विपरीत इंजीनियरी की बात करें तो पहाड़ में यह टिकने की ही नही बल्कि जाने को राजी भी नही होने की बात का संकेत देती है। यानि इंजीनियरिंग लाइन पहाड़ से नहीं कतराती हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि डॉक्टरी मे इमरजेंसी सेवा है लेकिन इंजीनियरिंग मे नहीं। डॉक्टर को हर दिन अपनी इमरजेंसी सेवा का भी मौका देना पड़ता है लेकिन इंजीनियरिंग में जिला मुख्यालय या फिर जिले के अन्य हिस्सों से राजधानी तक का सफर आसान रहता है।

एक दो अवकाश, सेकंड सैटरडे औऱ संडे मे सरकारी वाहन का लाभ भी उठा लिया जाता है। उत्तरकाशी से राजधानी का अपने छोटे वाहन मे सफर बमुश्किल 4 से 5 घंटे का है। 5 बजे राजधानी के लिए मूव करने पर 9 बजे रात्रि घर पर अधिकारी होता है। 6 से 7 बजे राजधानी से चलकर 11 बजे अपने ऑफिस में होता है इसलिए कही दिक़्कत नहीं है। डॉक्टर के लिए यहाँ थोड़ा मजबूरी है। वैसे यूपी के जमाने से ही पहाड़ में इंजीनियरिंग टिकती आ रही है जो उत्तराखंड बनने के बाद भी जस की तस है। जिले मे कुछ विभाग के सूत्र बताते हैं कि तबादला होने के बावजूद भी इंजीनियर हिलने को राजी नहीं है। कुछ इंजीनियर मार्च तक के जुगाड़ मे भी है।

इन विभागों में निगम,कारपोरेशन व अन्य विभाग भी हैं। आंखिर मार्च तक क्यों इसे सभी जानते है। कुल मिलाकर इंजीनियर आने को भी राजी है लेकिन जाने को भी नहीं तकते है। उधर मेडिकल की बात करें तो जिले समेत जिला मुख्यालय के भारी भरकम जिला अस्पताल में डॉक्टर का टोटा है।

हालात ये है कि डॉक्टर आने को राजी नहीं है और आ भी गए तो टिकने को राजी नहीं है। जिले को 104 डॉक्टर की जरूरत है लेकिन है सिर्फ 76 डॉक्टर। जिला अस्पताल को तीन दर्जन डॉक्टर चाहिए लेकिन है इसके आधे। कुछ महत्वपूर्ण स्पेशलिस्ट भी नहीं है। कुछ समय पूर्व जिला अस्पताल को 9 डॉक्टर मिले थे लेकिन हुआ यह कि 9 में से 3 पीजी कोर्स करना है को लेकर चले गए। एक डॉक्टर ने जॉइन नही किया तो एक जॉइन करने के बाद अपना प्लेस चेंज करा कर निकल लिया।

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