उत्तरकाशी : भैरोघाटी पुल: जब दो ठेकेदारों ने कर दिए थे हाथ खड़े…पढ़ें पूरा मामला

उत्तरकाशी : भैरोघाटी पुल: जब दो ठेकेदारों ने कर दिए थे हाथ खड़े…पढ़ें पूरा मामला

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  • संतोष साह / उत्तरकाशी

उत्तरकाशी। एक समय था जब भैरो घाटी पुल को बनाने पर दो ठेकेदार कंपनियों ने हाथ खड़े कर दिये थे । अगर आज की बात होती तो शायद ही ऐसा होता। जानकारी जुटाने पर पता चला कि जाड़ गंगा पर जिस स्थान पर यह पुल खड़ा है वहां से घाटी को देखकर ही तब ठेकेदारों ने डर के मारे पुल बनाने से हाथ खड़े कर दिये थे। यह वाकिया 1983 का बताया जाता है ।

उत्तरकाशी से 71 किलोमीटर दूर गंगोत्री राजमार्ग मे भैरोघाटी भले ही चर्चाओं या किताबों में न आया हो लेकिन यहाँ जाड़ गंगा जिसे जाह्नवी नदी भी कहते हैं के ऊपर 1986 मे 1 करोड 84 लाख 55 हजार की लागत से बने पुल को कई एशिया का सबसे ऊंचा पुल भी कहते हैं। 2660 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह पुल नदी से 410 फ़ीट की ऊंचाई पर है जबकि इसकी लंबाई 300 फ़ीट है। गौरतलब है कि 1986 से पहले भैरोघाटी से गंगोत्री जाने के लिए मोटर पुल नही था और तब यात्री जाड़ गंगा की घाटी मे कभी विल्सन के बनाये लकडी के पुल को पार कर गंगोत्री पंहुचते थे। 1986 मे रेलवे द्वारा भैरोघाटी पुल बनाए जाने के बाद गंगोत्री यात्रा आसान हो गई।

1986 मे जब यह पुल बना तो तब तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी ने इसका उद्घाटन किया था। लोक निर्माण विभाग की माने तो यह पुल एशिया में सर्वाधिक ऊंचाई पर दूसरे नम्बर का है लेकिन पहले नंबर का पुल कहाँ है इसकी उसको जानकारी नही है। वैसे किसी सामान्य ज्ञान की बुक मे यह पढ़ा गया है कि सर्वाधिक ऊंचा पुल चंबल की पहाड़ी मे है । बहरहाल कुछ भी हो लेकिन भैरोघाटी का पुल भी किसी आकर्षण से कम नही है। इस पुल के निर्माण के जो दिलचस्प पहलू हैं वह भैरोघाटी को तरोताजा करते हैं। 1976 मे सबसे पहले लोक निर्माण विभाग ने मात्र 17 लाख 50 हजार की लागत से इसके टेंडर आमंत्रित किये। बताते है कि टेंडर आमंत्रित करने के बाद सबसे पहले बिहार की एक ठेकेदार कंपनी आयी। इस ठेकेदार कंपनी के ठेकेदार ने जाड़ गंगा की गहरी खाई औऱ घाटी को देख हाथ खडे कर दिये। इसके बाद लोनिवि ने दूसरी ठेकेदार कंपनी यानि उत्तर प्रदेश सेतु निर्माण से संपर्क किया लेकिन उसने भी घाटी को देख पुल बनाने से मना कर दिया। अंत मे इंडियन रेलवे कारपोरेशन ने इस पुल को बनाने का बीड़ा उठाया औऱ पुल तैयार किया। वैसे भैरोघाटी पुल के अलावा भैरोघाटी प्राचीन काल से ही चर्चित रही हैं ।

कभी जब तिब्बत से आवागमन था तब भैरोघाटी प्रमुख पडाव हुआ करता था। हिमालयन गजेटियर मे ऐटिकसन की जिस पुस्तक का उल्लेख किया गया है उसमें भैरोघाटी तिब्बत को जाने वाला एक प्रमुख दर्रा था। इस दर्रे को तिब्बती चोंगसा कहते थे। भैरोघाटी का धार्मिक महत्व भी है। गंगोत्री धाम के कपाट खुलने और बंद होने पर यहां गंगा की डोली का विश्राम भैरोघाटी मंदिर मे होता है।

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