विश्व विख्यात वैज्ञानिक प्रोफेसर जी0 डी0 अग्रवाल ने नमामि गंगे की रक्षा के लिए दी प्राणों की आहुति

विश्व विख्यात वैज्ञानिक प्रोफेसर जी0 डी0 अग्रवाल ने नमामि गंगे की रक्षा के लिए दी प्राणों की आहुति

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  • डॉ रणवीर सिंह

स्वामी ज्ञान स्वरुप सानंद (प्रोफेसर गुरु दास अग्रवाल ) का जन्म सन 1932 में जिला मुजफ्फरनगर( कांधला) के प्रोग्रेसिव सोच के जमींदार परिवार में हुआ। उनके जीवन पर उनके बाबा बुधसिंह जो आर्यसमाजी थे का बड़ा प्रभाव था । उनकी माँ अधिकारी परिवार से थी ।वह अधिकारी बनाना चाहते थे, बाबा चाहते थे कि वो खेती करें। उनके बाबा जी कट्टर आर्यसमाजी थे। दादी जी कट्टर सनातनी थी। फिर भी दोनों साथ थे। बाबा जी, हवन संध्या करते थे। पूजा का प्रसाद लेते थे, लेकिन मूर्ति पूजा नहीं करते थे। शायद यही वजह है कि आज वो दो मतभेद वाले लोगों के बीच भी आसानी से राह बना लेते थे ।

10 साल की उम्र तक उन्होंने घर पर रहकर ही संस्कृत व शास्त्र पढ़ा। सात साल का था, तो उन्हें घर पर ही गणित-भूगोल पढ़ाना शुरू कर दिया था। 10 साल का होने के बाद सीधे छठी क्लास में उनका एडमीशन हुआ। उनका विश्वास था कि संस्कृत पढ़ें, तो मस्तिष्क का विकास होता है।1946 में उन्होंने कांधला के हिन्दू इंटर कॉलिज से हाईस्कूल किया। उनके एक प्राइवेट ट्युटर थे – बनारसी दास वैश्य।

स्वामी सानंद का मानना था यदि वे वैज्ञानिक बन पाये, तो उसमें 95 प्रतिशत भूमिका बनारसी दास जी की है।इंटर में उन्होंने विज्ञान पढ़ना शुरू किया और फिर BHU में B.Sc में प्रवेश लिया , गीता गंगा और धर्म के प्रति उनकी आस्था BHU में मालवीय जी के सान्निध्य में रह कर और मजबूत हुई।

B.Sc के बाद उन्होंने रूड़की में B.E सिविल इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया। उसके बाद उनकी नियुक्ति रिहन्द डैम पर हुई और कई साल तक वहां काम करते रहे। जब IIT कानपुर बना तो उसमें जो पहले कुछ अध्यापक चुने गए तो उसमें गुरु दास अग्रवाल जी भी थे। वो वहां १९६२- १९७९ तक विभिन्न पदों पर रहे और वहीँ रह कर अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय बर्कले से M.S. और Ph.D रिकॉर्ड समय में की।

IIT कानपुर में रहते हुए गंगा जल के विशेष गुणों पर उन्होंने रिसर्च की और कराइ। IIT कानपुर के डायरेक्टर से सैद्धांतिक विरोध के चलते उन्होंने इस्तीफा दिया और कांधला चले आये और कुछ दिनों खेती की। जब भारत में प्रदूषण नियत्रण विभाग बना तो उन्हें उसमें सदस्य सचिव नियुक्त किया गया और भारत में प्रदूषण सम्बंधित नियम बनाने में उनका बड़ा योगदान था। पर सरकार के/ उद्योगपतियों के नियमों में बदलाव के दबाव के चलते अपनी ईमानदार छवि के साथ वो वहां से भी इस्तीफा दे कर आ गए और उसके बाद एन्वायरोटेक नाम से प्रदूषण मापने के यंत्र बनाने वाली एक कंपनी की स्थापना की।
वो जीवन भर अविवाहित रहे। अपने जीवन में वो विभिन्न समाज सेवी संस्थाओं से जुड़ उन्हें तकनीकी , आर्थिक और मोरल सहायता करते रहे।

इन संस्थाओं में तरुण भारत संघ , पीपल साइंस इंस्टिट्यूट , centre for science & environment वनवासी सेवा आश्रम शामिल हैं। प्रसिद्ध समाज सेवी M.C मेहता और भारत झुनझुन वाला भी पर्यावरण से सम्बंधित विषयों में उन्हीं से सलाह लेते थे। साल २००९ से उन्होंने अपना जीवन गंगा जी को अर्पण करने का निश्चय किया और १३ जून २००९ में पहला अनशन किया जिसकी परिणीति गंगोत्री से उत्तरकाशी तक १४५ किलोमीटर के क्षेत्र को एक सेंसिटिव जोन घोषित करने और गंगा जी के ऊपरी भाग में ३ परियोजनाओं के निरस्त करने से हुई। गंगा जी की अविरलता के लिए वो लगातार पर्यटन करते रहे , कई अनशन किये , गिरधर मालवीय जी (महमना मालवीय जी के पुत्र ) और गंगा महासभा के साथ मिलकर एक कानून का प्रारूप तैयार किया जिसे वो चाहते थे की सरकार पास करे जिससे गंगा मां की निर्मलता और अविरलता सुनसिचित की जा सके।

पिछली २२ जून से वो मातृ सदन कनखल हरिद्वार में तपस्या रत थे गंगा जी की अविरलता और निर्मलता के लिए। उनकी मुख्य मांगें निम्न थी
१ गंगा महासभा के साथ मिलकर तैयार कानून की तर्ज पर सरकार कानून बनाये।
२. जब तक कानून बन कर पारित न हो जाए भागीरथी जी /अलकनंदा /मंदाकनी पर बन रहे बांधों पर काम रुके।
३. भागीरथी जी /अलकनंदा /मंदाकनी में पर्यावरणीय फ्लो सुनिश्चित किया जाए।
४. गंगा भक्त परिषद् का गठन
९ अक्टूबर से उन्होंने जल त्याग कर दिया था और उन्हें प्रशाशन द्वारा जबरदस्ती ऋषिकेश AIIM.S में भर्ती करा दिया गया था। कल दोपहर २ बजे उनका देहांत हो गया.

विश्व विख्यात वैज्ञानिक प्रोफेसर जी0 डी0 अग्रवाल ने नमामि गंगे की रक्षा के लिए दी प्राणों की आहुति।

आज गंगा पुत्र प्रोफेसर जी.डी.अग्रवाल जी (साइंटिस्ट) 113 दिन से गंगे माँ की रक्षा के लिए अनशन पर बैठे हुए थे, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति गंगा माँ के लिए दी।
कांधला के मूल निवासी और विश्व भर में विख्यात गंगा पुत्र महान वैज्ञानिक ने अपनी वसीयत में अपना शरीर तक AIMS हॉस्पिटल को दान में दिया।

स्वामी ज्ञान स्वरुप सानन्द नहीं रहे। ईश्वर उनकी आत्मा को सद्गति दें। अगर तस्वीर और नाम से वो आपको सिर्फ कोई सन्यासी लग रहे हैं तो इसमें आपकी गलती नहीं है। पर्यावरण और विशेषकर गंगा के लिए काम कर रहे लोगों को जानता ही कौन है? सन 2002 में उनके छात्र रहे लोगों ने उन्हें “श्रेष्ठ शिक्षक” (Best Teacher) का सम्मान दिया था। जब वो शिक्षण से जुड़े थे तो वो आई.आई.टी. कानपुर में सिविल और पर्यावरण इंजीनियरिंग के विभाग के प्रमुख थे। आई.आई.टी. रुड़की से सिविल इंजिनियर प्रोफेसर अग्रवाल बाद में सेंट्रल पॉल्यूशन कण्ट्रोल बोर्ड के प्रमुख भी थे।

गंगा की बेहतरी, उसकी स्वच्छता जैसे विषयों पर काम करते दूसरे कई लोगों की तरह ही स्वामी सानन्द भी मानते थे कि गंगा की धारा अविरल बहनी चाहिए। अविरल का मतलब मुख्य धारा को जगह जगह बाँध बनाकर पानी का बहाव कम न किया जाए। नेशनल गंगा रिवर बेसिन ऑथरिटी के काम करने के तरीकों से भी उनकी असहमति थी। उनका ख़याल था कि सरकारी इंजिनियर गंगा की शुद्धता नाप ही नहीं सकते! पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले कई बड़े नाम (तरुण भारत संघ वाले राजेन्द्र सिंह भी) उनके शिष्यों में शामिल थे।

मदन मोहन मालवीय ने जो गंगा महासभा बनाई थी वो उसके प्रमुख भी थे। इसी वर्ष 24 फ़रवरी को उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर 125 किलोमीटर में बन रही छह परियोजनाओं पर अपनी आपत्ति जताई थी (पत्र खुला है और उनकी वेबसाइट पर देखा जा सकता है)। इससे पहले वो 2009 और 2013 में भी अनशन कर चुके थे। उनके अनशन पर जब कांग्रेसी सरकार ने ध्यान नहीं दिया था तो राजेन्द्र सिंह, रवि चोपड़ा और रशीद सिद्दीकी ने नेशनल गंगा बेसिन अथॉरिटी से इस्तीफा भी दे दिया था। मगर वो कांग्रेसी सरकारों का दौर था।

इस बार स्वामी सानन्द का अनशन करीब 113 दिन चला। राजहठ के आगे 79 की आयु में संन्यास लेने वाले शिक्षक का शरीर कितने दिन टिकता? हुतात्मा सेनानी को सादर नमन…

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