किन्नौर : पौराणिक काल से चली आ रही चगाँव में आयरेचांग मेले की धूम

किन्नौर : पौराणिक काल से चली आ रही चगाँव में आयरेचांग मेले की धूम

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  • समर नेगी / किन्नौर

निचार तहसील के चगाँव गांव में आयरेचांग मेला का आयोजन पुराने रीति रिवाज सहित बड़े ही हर्षोउल्लास के साथ मनाया गया। पुराने समय से चली आ रही इस परम्परागत मेले को 25 जेठ के दिन ही मनाया जाता रहा है। एवम साल की पहली फसल की कटाई की ख़ुशी के रूप में भी मनाया जाता है।

ज्ञात है कि यह मेला केवल किन्नौर के इसी गांव में ही मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल के समय जब पांडव वनवास के दौरान हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में भटक रहे थे तो यहाँ से गुजरते समय इन्ही पहाड़ो में अपना जीवन यापन कर रहे थे उस समय एक विशेष प्रकार का फूल जिसे शुशुर के नाम से जाना जाता है नामक फूल उनके द्वारा बोया गया था।

उस फूल को आस्था के रूप में मानते हुए तथा पुराने समय से ही इस मेले के लिए विशेष प्रकार का फूल को लाया जाता रहा है।


देवता के माली भगत चंद बईरयान ने बताया कि मेले के एक दिन पूर्व ही इस गांव के इष्ट देवता महेश्वर, नारायण के द्वारा चुने हुए कुछ विशेष लोग गांव की उस पहाड़ी की ओर रवाना होते है जहाँ पर यह विशेष प्रकार का फूल पाया जाता है। उक्त स्थान से फूल लेकर उसी रात राकछु नामक स्थान पर पत्थर का बना हुआ एक पानी के झरने के नीचे फूलो को रखा जाता है।

ऐसा माना जाता है पांडव रात के समय यहाँ पर एक आटा चक्की (घराट) का निर्माण जो पानी से चलने वाला होता है बनाने के लिए पत्थर का पाइप जैसा तैयार कर रहे थे कि प्रातः जागरण होते देख उन्हें अपना काम अधूरा छोड़ कर जाना पड़ा था। उनके द्वारा बनाया गया पौराणिक पत्थर के पाइप लाइन के झरने के नीचे उन फूलो को रखा जाता है व् अगली सुबह उस स्थान पर पूजा पाठ करने के उपरांत उन फूलो (शुशुर) को लेकर दैवीय स्थल मालास्टिंग नामक स्थान पर लाया जाता है।

इधर मंदिर प्रांगण से महेश्वर देवता व् नारायण देवता भी उक्त स्थान पर वाद्य यंत्रों,ढ़ोल नगाड़ो व् किन्नौरी वेश भूषा धारण किए हुए लोगों के साथ पहुँच जाते है। उसके पश्चात् देवता के द्वारा उन फूलो को मेले देखने आए स्थानीय ग्रामवासी व बाहर से आये हुए मेहमानों के बीच आशीर्वाद के तौर पर बांटा जाता है। तत्पश्चात माली को विशेष प्रकार का पहनावा ( चाँदी से लदा हुआ) नागिन देवी का वेश धारण करवाया जाता है।

उसके बाद देवता का हांड़ी (क्रोव) माली को पकड़ाया जाता है व् कोठी के चारों और से तीन चक्कर मेला लगाया जाता है । इस दौरान मैले के बिच बिच में उस हांड़ी से पानी गिराया जाता है तथा इस गिरते हुए पानी के सम्पर्क में आने के लिए लोगों को काफी मशक्कत व् धक्कामुक्की का सामना भी करना पड़ता है। ऐसी मान्यता है कि जिसे भी यह पानी पिने या भीगने का अवसर प्राप्त होता है उसे रोगों व् बीमारियों से छुटकारा मिल जाता है। उसके उपरान्त नागिन देवता को विदा करने के बाद देवता वापिस मंदिर की ओर आते है व् सभी ग्रामीण व् बाहर से आए हुए मेहमान इक्टठे होकर मंदिर में मेला लगाते है।

इस अनोखे मेले को देखने स्थानीय लोगों के अलावा भी आसपड़ोस के गांव व दूसरे क्षेत्रों से भी लोग इस मेले को देखते आते है तथा विशेष रूप से इस गांव से बाहर दूसरे गांव व दूर क्षेत्रो में शादी हुई इस गांव की महिलाओं व् उनके बच्चों को भी आमंन्त्रित किया जाता है।

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