5 जून विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष।

5 जून विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष।

डॉ रणवीर सिंह वर्मा

भारतीय चिंतन में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है जितना कि मानव धारण का इतिहास। प्रकृति के क्रिया कलापों की विविध गतिविधियोें का वेदों मेें भली-भॉति वर्णन है और प्रकृति की क्रिया-कलाप भी वैज्ञानिक नियमों पर आधारित है। इन नियमों का उल्लंघन विनाश प्रक्रिया को आमंत्रण देता है। वेंदों में विभिन्न सूत्रों में प्रक्रति की महत्ता को दर्शाया गया है। ऋगवेद में अग्नि के स्वरुप, को कार्य और गुणों की विस्तृत व्याख्या की गई है। अथर्ववेद के अनुसार->>’यस्या हृदयं परमेव्योमन्।’अर्थात जैसे हृदय की धडक़न पर प्राणी का जीवन निर्भर करता है। उसी प्रकार से अंतरिक्ष (परम व्योम) की ही सुरक्षा में ही पृथ्वी और पर्यावरण की सुरक्षा निहित है। पर्यावरण संतुलन न केवल मानव जाति के लिए बल्कि संपूर्ण पृथ्वी पर पाए जाने वाले समस्त जीवों के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। पर्यावरण प्रबंध के प्रति मानव की संवेदनशीलता को केवल वर्तमान में ही नहीं बल्कि पा्रचीन समय में भी देखा जा सकता है। यही कारण है कि प्राचीन भारतीय इतिहास पर दृष्टि डालें तो यह ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शासन करने वाले विभिन्न राजवंशों के शासकों द्वारा पर्यावरणीय प्रबंध से संबंधित अनेक कार्य किए गए। यज्वपाल नामक राजवंशों के शासकों द्वारा पर्यावरणीय प्रबंध हेतु वाटिकाओं (उद्यानों), वापियों (बावडियों) और कुपों (कुओं) आदि का निर्माण करवाने की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।पौराणिक आख्यान पर आधारित ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ में कालिदास पृथकत्व की अपेक्षा प्रकृति का मानवीकरण कर मनुष्य के साथ उसका परस्परापेक्षी सहअस्तित्व स्वीकार करते हुए, प्रकृति के आठ रुपों में भगवान शिव की आठ मूर्तियों की कल्पना कर उसी से विश्वमंगल की कामना करते है। वाल्मीकीय रामायण भी पर्यावरण चेतना से ओत-प्रोत रही है। रामायण में पर्यावरण के तीनों क्षेत्रों जल मंडल, वायु मंडल के प्रदूषण निवारण के लिए उपाय बताए गए है। इनमें शुद्ध एवं निर्मल जल की अलौकिकता और पवित्रता का समुचित वर्णन किया गया है। और जल को दूषित करने वालों के लिए दंड का भी विधान किया गया है। वायु के प्रकुपित और प्रदुषित होने के दुष्परिणाम भी इस महाकाव्य में वर्णित है। >>वायु: प्राण: सुखं वायुर्वायु: सर्वामिदं जगत्।वायुना सम्परित्यक्त: न सुखं विन्दते जगत्॥ग्लोबल वार्मिंग के रुप में पर्यावरण के प्रदूषण का भयावह और विनाशकारी रुप आज हमारे सामने उपस्थित है। औद्योगीकरण की आपाधापी ने शहरों का वातावरण पूर्ण से प्रभावित कर दिया है जिसकी वजह से प्रकृति में आश्चर्यजनक परिवर्तन देखने को मिलते रहते है। हिमनंदों के अस्तित्व से लेकर जलवायु चक्र में परिवर्तन देखते है। जिसकी वजह से पृथवी का तापमान बढ रहा है। और बडे ग्लेशियर पिघल रहे है। साथ ही पृथ्वी की सतह के अन्दर का मजबूत घरातल भी गल रहा है। पर्यावरण का प्रभाव व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकास को प्रभावित करता है। स्वच्छ पर्यावरण स्वच्छ मस्तिष्क एवं स्वस्थ विचारों की पहचान है। हमारे देश का धर्म और साहित्य दोनों ही पर्यावरण से प्रभावित होते है। पेड-पौधे, नदी, पर्वत, एवं पशु-पक्षियों को देवी-देवताओं की तरह पूजा जाता है। विभिन्न कर्मकांडों एवं अनुष्ठानों का निर्माण पर्यावरण को ध्यान में रखकर बनाया गया। पर्यावरण का प्रभाव कला और साहित्य पर भी निश्चित रुप पडता है। रचनाकार तो हमेशा से ही प्रकृति-प्रमी रहे है। कबीर कहते हैं->कबीर सीप समंद की, रटै पियास पियास,समंदहि तिनका बरि गिनै, स्वाति बूँद की आस॥

>>काहे री नलिनी तै कुम्हिलानी,तेरे ही नाल सरोवर पानी।जल में उत्त्पति जल में बासजल में नलिनी तोर निवास।जायसी ने पद्मावत में प्रकृति के मनोरम रुपों का वर्णन है। विरह-वेदना में प्रकृति का चित्रण करते हुए, आसाढ़ के बाद सावन और भादों का महिना आता है। नायिका की वेदना तीव्र हो उठती है, धरती जलमय हुई, नायिका विरह से सूख गई-

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