भाबर के पेड पहाड़ मे लगेंगे तो सूखेंगे ही,कसूर बजट का है जिसे प्लांटेशन के नाम पर खपाना भी तो है

भाबर के पेड पहाड़ मे लगेंगे तो सूखेंगे ही,कसूर बजट का है जिसे प्लांटेशन के नाम पर खपाना भी तो है

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संतोष साह / उत्तरकाशी
स्वच्छता अभियान की तरह प्लांटेशन भी मजाक बन कर रह गया है। गत वर्ष की गर्मी और बरसात मे रिबन काटकर विभिन्न विभागों द्वारा किये गए प्लांटेशन की सर्द पाले व ठंड ने पोल खोल कर रख दी है। 6 माह पूर्व लगाए गए पेड़ या तो दम तोड़ चुके है या फिर अंतिम सांस ले रहे हैं। दरअसल प्लांटेशन के नाम पर आए बजट को खपाने औऱ ठिकाने लगाने के लिए जो भी प्लांट मिल जाय उसका रोपण कर अक्सर वाहवाही लूटी जाती है। मैदानों में स्थित नर्सरियों मे से कुछ भी हरा भरा प्लांट लाकर उसे रोप दिया जाता है। लेकिन प्लांट किस जलवायु के अनुकूल है इसे नहीं देखा जाता। इससे साफ होता है कि प्लान्टेशन के नाम पर बजट का दुरुपयोग हो रहा है। गत वर्ष प्लान्टेशन के नाम पर कतिपय सरकारी विभागों ने समय -समय पर विभिन्न प्रजातियों के प्लांट लगाए। इनमे वे प्लांट लगाए गए जो पहाड़ को सूट नही करते और भाबर के ही जलवायु के अनुकूल थे। लेकिन ऐसे प्लांटों को पहाड़ में लाकर सिर्फ वृक्षरोपण अभियान चलाने की खानापूर्ति की गई। हालात ये है कि जो प्लांट 6 माह पूर्व लगाए गए वे सूख गए हैं या फिर पाले से मर गए हैं। सबसे बड़ा सवाल पेड़ लगाने के बाद उसकी हिफाजत न तो आसपास की आबादी करती है और न ही पेड लगाने वाली एजेंसी कोई जिम्मेदारी लेती है। गौरतलब है कि गत वर्ष कई स्थानों में हुए प्लांटेशन पर प्लांटों की प्रजाति को लेकर हमे हॉर्टिकल्चर की जानकारी रखने वालों ने भी बताया था कि जो प्लांट लग रहे हैं वे पहाड़ के लिये अनुकूल नही है बेहतर होता कि पहाड के जलवायु के अनुकूल प्लांट लगाए जाते तो बेहतर होता।

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