2018 होली की तिथि और होली की परंपरा जानें।

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सनसनी सुराग न्यूज
नवीन गोयल
मुज़फ्फरनगर
सभी को सनसनी सुराग न्यूज की ओर से होली की शुभकामनाये

2018 होली की तिथि और होली की परंपरा जानें

होली फाल्गुन मास 1 की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। फाल्गुन मास हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष का अंतिम मास होता है। इस वर्ष होलिका दहन 1 मार्च और धुलण्डी 2 मार्च को मनाई जाएगी।

होली का त्यौहार

भारत में होली का त्यौहारोत्सव सभी के जीवन मे बहुत सारी खुशियॉ और रंग भरता है, लोगों के जीवन को रंगीन बनाने के कारण इसे आमतौर पर ‘रंग महोत्सव’ कहा गया है। यह लोगो के बीच एकता और प्यार लाता है। इसे “प्यार का त्यौहार” भी कहा जाता है। यह एक पारंपरिक और सांस्कृतिक हिंदू त्यौहार है, जो प्राचीन समय से पुरानी पीढियों द्वारा मनाया जाता रहा है और प्रत्येक वर्ष नयी पीढी द्वारा इसका अनुकरण किया जा रहा है।

यह एक प्यार और रंगो का त्यौहार है जो प्रत्येक वर्ष हिन्दू धर्म के लोगों द्वारा आनन्द और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह मन को तरोताज़ा करने का त्यौहार है,जो न केवल मन को तरोताजा करता है बल्कि रिश्तों को भी करता है। यह ऐसा त्यौहार है जिसे लोग अपने परिवार के सदस्यो और रिश्तेदारों के साथ प्यार और स्नेह वितरित करके मनातें हैं जो उनके रिश्तों को भी मजबूती प्रदान करता हैं। यह एक ऐसा त्यौहार हैं जो लोगों को उनके पुराने बुरे व्यवहार को भुला कर रिश्तों की एक डोर मे बॉधता हैं।

इस दिन लोग लाल रंग और लाल गुलाल का प्रयोग करते है जो केवल लाल रंग नही है बल्कि एक दूसरे से प्यार और स्नेह का भी प्रतीक हैं। वास्तव मे यह न केवल लोगों को बाहर से रंगता हैं, बल्कि उनकी आत्मा को भी विभिन्न रंगों मे रंग देता हैं। इसे साधारण त्यौहार कहना उचित नही है क्योंकि यह बिना रंगे व्यक्तियों को रंग देता हैं। यह लोगों के व्यस्त जीवन की सामान्य दिनचर्या मे एक अल्पविराम लाता हैं।

यह भारतीय मूल के हिंदुओं द्वारा हर जगह मनाया जाता है हालांकि, यह मुख्य रूप से भारत और नेपाल के लोगों द्वारा मनाया जाता है। यह एक त्यौहारी रस्म है, जिसमे सब एक साथ होलिका के आलाव को जलाते है, गाना गाते है और नाचते है, इस मिथक के साथ कि सभी बुरी आदतें और बुरी शक्तियॉ होलिका के साथ जल गयी और नई ऊर्जा और अच्छी आदतों से अपने जीवन में उपलब्धियों को प्राप्त करेंगें। अगली सुबह उनके लिये बहुत खुशियॉ लेकर आती है जिसे वे पूरे दिन रंग और जुआ खेलकर व्यक्त करते हैं।

होली खेलने के लिए वे खुले सड़क, पार्क और इमारतों में पानी की बंदूकों (पिचकारी) और गुब्बारे का उपयोग करते है। कुछ संगीत वाद्ययंत्र गीत गाने और नृत्य करने के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। वे अपना पूरा दिन रंग, गायन, नृत्य, स्वादिष्ट चीजें खाने, पीने, एक-दूसरे के गले मिलने, दोस्तों के घर पर मिलने और बहुत सारी गतिविधियों मे व्यतीत करते है।

होली 2018

होली का त्यौहार भारत और विदेशों में रहने वाले भारतियों द्वारा शुक्रवार, 2 मार्च 2018 को पूरे उत्साह के साथ मनाया जायेगा।

होली कब मनाई जाती है

हिंदू कैलेंडर के अनुसार, होली महोत्सव फाल्गुन पूर्णिमा में मार्च (या कभी कभी फरवरी के महीने में) के महीने में वार्षिक आधार पर मनाया जाता है। यह त्यौहार बुराई की सत्ता पर अच्छाई की विजय का भी संकेत है। यह ऐसा त्यौहार है जब लोग एक दूसरे से मिलते हैं, हँसते हैं, समस्याओं को भूल जाते हैं और एक दूसरे को माफ करके रिश्तों का पुनरुत्थान करते है। यह चंद्र मास, फाल्गुन की पूर्णिमा के अंतिम दिन, गर्मी के मौसम की शुरुआत और सर्दियों के मौसम के अंत में, बहुत खुशी के साथ मनाया जाता है। यह बहुत सारी मस्ती और उल्लास की गतिविधियों का त्यौहार है जो लोगों को एक ही स्थान पर बाँधता है। हर किसी के चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान होती है और अपनी खुशी को दिखाने के लिए वे नए कपड़े पहनते हैं।

होली क्यों मनायी जाती है

हर साल होली के त्यौहार को मनाने के कई कारण हैं। यह रंग, स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ, एकता और प्रेम का भव्य उत्सव है। परंपरागत रूप से, यह बुराई की सत्ता पर या बुराई पर अच्छाई की सफलता के रुप मे मनाया जाता है। यह “फगवाह” के रूप में नामित किया गया है, क्योंकि यह हिन्दी महीने, फाल्गुन में मनाया जाता है।

होली शब्द “होला” शब्द से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है नई और अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए भगवान की पूजा। होली के त्योहार पर होलिका दहन इंगित करता है कि, जो भगवान के प्रिय लोग है उन्हे पौराणिक चरित्र प्रहलाद की तरह बचा लिया जाएगा, जबकि जो भगवान के लोगों से तंग आ चुके है उन्हे एक दिन पौराणिक चरित्र होलिका की तरह दंडित किया जाएगा ।

होली का त्यौहार मनाने के पीछे (भारत में पौराणिक कहानी के) कई ऐतिहासिक महत्व और किंवदंतियों रही हैं। यह कई सालों से मनाया जाने वाला, सबसे पुराने हिंदू त्यौहारों में से एक है। प्राचीन भारतीय मंदिरों की दीवारों पर होली उत्सव से संबंधित विभिन्न अवशेष पाये गये हैं। अहमदनगर चित्रों और मेवाड़ चित्रों में 16 वीं सदी के मध्यकालीन चित्रों की मौजूदा किस्में हैं जो प्राचीन समय के दौरान होली समारोह का प्रतिनिधित्व करती है।

होली का त्योहार प्रत्येक राज्य में अलग-अलग है जैसे देश के कई राज्यों में, होली महोत्सव लगातार तीन दिन के लिए मनाया जाता है जबकि, अन्य विभिन्न राज्यों में यह एक दिन का त्यौहार है। लोग पहला दिन होली (पूर्णिमा के दिन या होली पूर्णिमा), घर के अन्य सदस्यों पर रंग का पाउडर बरसाकर मनाते हैं। वे एक थाली में कुछ रंग का पाउडर और पानी से भरे पीतल के बर्तन डालने से समारोह शुरू करते हैं। त्यौहार का दूसरा दिन “पुनो” कहा गया इसका अर्थ है कि त्यौहार का मुख्य दिन, जब लोग मुहूर्त के अनुसार होलिका का अलाव जलाते है।
यह प्रक्रिया बुराई के ऊपर अच्छाई की विजय के उपलक्ष्य में होलिका और प्रहलाद के प्राचीन इतिहास के मिथक के रुप मनाया जाता है। तीसरे दिन का त्योहार “पर्व” कहलाता है अर्थात् त्योहार का अंतिम दिन, जब लोग अपने घरों से बाहर आते है, एक दूसरे को गले लगाते है, माथे पर गुलाल लगाते है, रंगों से खेलते है, नाचते है, गाते है, एक दूसरे से मिलते है, स्वादिष्ट व्यंजन खाते हैं और बहुत सारी गतिविधियॉ करते है। रीति रिवाजों और परंपराओं के अनुसार होली उत्तर प्रदेश में ‘लट्ठमार होली’ के रूप में, असम में “फगवाह” या “देओल”, बंगाल में ‘ढोल पूर्णिमा”, पश्चिम बंगाल में ”ढोल जात्रा”, और नेपाल आदि में “फागू” नामों से लोकप्रिय है।

 

मथुरा और वृंदावन में होली

होली महोत्सव मथुरा और वृंदावन में एक बहुत प्रसिद्ध त्यौहार है। भारत के अन्य क्षेत्रों में रहने वाले कुछ अति उत्साही लोग मथुरा और वृंदावन में विशेष रूप से होली उत्सव को देखने के लिए इकट्ठा होते हैं। मथुरा और वृंदावन महान भूमि हैं जहां, भगवान कृष्ण ने जन्म लिया और बहुत सारी गतिविधियों की। होली उनमें से एक है। इतिहास के अनुसार, यह माना जाता है कि होली त्योहारोत्सव राधा और कृष्ण के समय से शुरू किया गया था। राधा और कृष्ण शैली में होली उत्सव के लिए दोनों स्थान बहुत प्रसिद्ध हैं।

मथुरा में लोग मजाक-उल्लास की बहुत सारी गतिविधियों के साथ होली का जश्न मनाते है। होली का त्योहार उनके लिए प्रेम और भक्ति का महत्व रखता है, जहां अनुभव करने और देखने के लिए बहुत सारी प्रेम लीलाऍ मिलती है। भारत के हर कोने से लोगों की एक बड़ी भीड़ के साथ यह उत्सव पूरे एक सप्ताह तक चलता है। वृंदावन में बांके-बिहारी मंदिर है जहां यह भव्य समारोह मनाया जाता है। मथुरा के पास होली का जश्न मनाने के लिए एक और जगह है गुलाल-कुंड जो की ब्रज में है, यह गोवर्धन पर्वत के पास एक झील है। होली के त्यौहार का आनंद लेने के लिये बड़े स्तर पर एक कृष्ण-लीला नाटक का आयोजन किया जाता है।

बरसाने में होली या लठमार होली

बरसाना में लोग हर साल लट्ठमार होली मनाते हैं, जो बहुत ही रोचक है। निकटतम क्षेत्रों से लोग बरसाने और नंदगांव में होली उत्सव को देखने के लिए आते हैं। बरसाना उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में एक शहर है। लट्ठमार होली, छड़ी के साथ एक होली उत्सव है जिसमें महिलाऍ छड़ी से पुरुषों को मारती है। यह माना जाता है कि, छोटे कृष्ण होली के दिन राधा को देखने के लिए बरसाने आये थे, जहां उन्होंने उन्हें और उनकी सखियों को छेड़ा और बदले में वह भी उनके द्वारा पीछा किये गये थे। तब से, बरसाने और नंदगांव में लोग छड़ियों के प्रयोग से होली मनाते हैं जो लट्ठमार होली कही जाती है। आस-पास के क्षेत्रों से हजारों लोग बरसाने में राधा रानी मंदिर में लट्ठमार होली का जश्न मनाने के लिए एक साथ मिलते है। वे होली के गीत भी गाते हैं और श्री राधे और श्री कृष्ण का बयान करते है। प्रत्येक वर्ष नंदगांव के गोप या चरवाहें बरसाने की गोपियों या महिला चरवाहों के साथ होली खेलते है और बरसाने के गोप या चरवाहें नंदगांव की गोपियों या महिला चरवाहों के साथ होली खेलते है। कुछ सामूहिक गीत पुरुषों द्वारा महिलाओं का ध्यान आकर्षित करने के लिए गाये जाते है; बदले में महिलाऍ आक्रामक हो जाती हैं और लाठी के साथ पुरुषों को मारती है। यहाँ पर कोल्ड ड्रिंक या भांग के रूप में ठंडई पीने की परंपरा है।

होली महोत्सव का इतिहास और महत्व

होली का त्यौहार अपनी सांस्कृतिक और पारंपरिक मान्यताओं की वजह से बहुत प्राचीन समय से मनाया जा रहा है। इसका उल्लेख भारत की पवित्र पुस्तकों,जैसे पुराण, दसकुमार चरित, संस्कृत नाटक, रत्नावली और भी बहुत सारी पुस्तकों में किया गया है। होली के इस अनुष्ठान पर लोग सड़कों, पार्कों, सामुदायिक केंद्र, और मंदिरों के आस-पास के क्षेत्रों में होलिका दहन की रस्म के लिए लकड़ी और अन्य ज्वलनशील सामग्री के ढेर बनाने शुरू कर देते है। लोग घर पर साफ- सफाई, धुलाई, गुझिया, मिठाई, मठ्ठी, मालपुआ, चिप्स आदि और बहुत सारी चीजों की तैयारी शुरू कर देते है। होली पूरे भारत में हिंदुओं के लिए एक बहुत बड़ा त्यौहार है, जो ईसा मसीह से भी पहले कई सदियों से मौजूद है। इससे पहले होली का त्यौहार विवाहित महिलाओं द्वारा पूर्णिमा की पूजा द्वारा उनके परिवार के अच्छे के लिये मनाया जाता था। प्राचीन भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस त्यौहार का जश्न मनाने के पीछे कई किंवदंतियों रही हैं।

होली हिंदुओं के लिए एक सांस्कृतिक, धार्मिक और पारंपरिक त्यौहार है। होली शब्द “होलिका” से उत्पन्न है। होली का त्यौहार विशेष रूप से भारत के लोगों द्वारा मनाया जाता है जिसके पीछे बड़ा कारण है।

होली के क्षेत्र वार उत्सव के अनुसार, इस त्यौहार के अपने स्वयं के पौराणिक महत्व है, जिसमें सांस्कृतिक, धार्मिक और जैविक महत्व शामिल है। होली महोत्सव का पौराणिक महत्व ऐतिहासिक किंवदंतियों के अंतर्गत आता है जो इस त्यौहार के साथ जुड़ी है।

 

पौराणिक महत्व

होली उत्सव का पहला पौराणिक महत्व प्रहलाद, होलिका और हिरण्याकश्यप की कथा है। बहुत समय पहले, हिरण्याकश्यप नामक एक राक्षस राजा था। उसकी बहन का नाम होलिका था और पुत्र प्रह्लाद था। बहुत वर्षों तक तप करने के बाद, उसे भगवान ब्रह्मा द्वारा पृथ्वी पर शक्तिशाली आदमी होने का वरदान प्राप्त हुआ। उन शक्तियों ने उसे अंहकारी बना दिया, उसे लगा कि केवल वह ही अलौकिक शक्तियों वाला भगवान है। वह तो उसने हर किसी से खुद को भगवान के रूप में उसे पूजा करने की मांग शुरू कर दी।
लोग बहुत कमजोर और डरे हुए थे और बहुत आसानी से उसका अनुकरण करना शुरू कर दिया, हालांकि, उसका बेटा जिसका नाम प्रहलाद था, अपने ही पिता के फैसले से असहमत था। प्रहलाद बचपन से ही बहुत धार्मिक व्यक्ति था, और हमेशा भगवान विष्णु को समर्पित रहता था। प्रहलाद का इस तरह के व्यवहार उसके पिता, हिरणयाकश्प को बिल्कुल पसन्द नहीं था। उसने प्रलाद को कभी अपना पुत्र नही माना और उसे क्रूरता से दण्ड देना शुरु कर दिया। हालांकि, प्रहलाद हर बार आश्चर्यजनक रुप से कुछ प्राकृतिक शक्तियों द्वारा बचाया गया।
अंत में, वह अपने बेटे के साथ तंग आ गया और कुछ मदद पाने के लिए अपनी बहन होलिका को बुलाया। उसने अपने भतीजे को गोद में रख कर आग में बैठने की एक योजना बनाई, क्योंकि उसे आग से कभी भी नुकसान न होने का वरदान प्राप्त था। उसने आग से रक्षा करने के लिए एक विशेष शाल में खुद को लपेटा और प्रहलाद के साथ विशाल आग में बैठ गयी। कुछ समय के बाद जब आग बडी और भयानक हुई उसकी शाल प्रहलाद को लपेटने के लिए दूर उडी। वह जल गयी और प्रहलाद को उसके भगवान विष्णु द्वारा बचा लिया गया। हिरण्याकश्प बहुत गुस्से में था और अपने बेटे को मारने के लिए एक और चाल सोचना शुरू कर दिया।वह दिन जब प्रहलाद को बचाया गया था होलिका दहन और होली को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक के रूप में मनाना शुरू कर दिया।होली महोत्सव का एक अन्य पौराणिक महत्व राधा और कृष्ण की कथा है। ब्रज क्षेत्र में होली के त्यौहार को मनाने के पीछे राधा और कृष्ण का दिव्य प्रेम है। ब्रज में लोग होली दिव्य प्रेम के उपलक्ष्य में को प्यार के एक त्योहार के रूप में मनाते हैं। इस दिन, लोग गहरे नीले रंग की त्वचा वाले छोटे कृष्ण को और गोरी त्वचा वाली राधा को गोपियों सहित चरित्रों को सजाते है। भगवान कृष्ण और अन्य गोपियों के चहरे पर रंग लगाने जाते थे।दक्षिणी भारतीय क्षेत्रों में होली के अन्य किंवदंती, भगवान शिव और कामदेव की कथा है। लोग होली का त्यौहार पूरी दुनिया को बचाने के लिये भगवान शिव के ध्यान भंग करने के भगवान कामदेव के बलिदान के उपलक्ष्य में मनाते है।होली का त्यौहार मनाने के पीछे ऑगरेस धुंन्धी की गाथा प्रचलित है। रघु के साम्राज्य में ऑगरेस धुंन्धी बच्चों को परेशान करता था। होली के दिन वह बच्चों के गुर से खुद दूर भाग गया।

 

सांस्कृतिक महत्व

होली महोत्सव मनाने के पीछे लोगों की एक मजबूत सांस्कृतिक धारणा है। इस त्योहार का जश्न मनाने के पीछे विविध गाथाऍ लोगों का बुराई पर सच्चाई की शक्ति की जीत पर पूर्ण विश्वास है। लोग को विश्वास है कि परमात्मा हमेशा अपने प्रियजनों और सच्चे भक्तो को अपने बङे हाथो में रखते है। वे उन्हें बुरी शक्तियों से कभी भी हानि नहीं पहुँचने देते। यहां तक कि लोगों को अपने सभी पापों और समस्याओं को जलाने के लिए होलिका दहन के दौरान होलिका की पूजा करते हैं और बदले में बहुत खुशी और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं। होली महोत्सव मनाने के पीछे एक और सांस्कृतिक धारणा है, जब लोग अपने घर के लिए खेतों से नई फसल लाते है तो अपनी खुशी और आनन्द को व्यक्त करने के लिए होली का त्यौहार मनाते हैं।
सामाजिक महत्व

होली के त्यौहार का अपने आप में सामाजिक महत्व है, यह समाज में रहने वाले लोगों के लिए बहुत खुशी लाता है। यह सभी समस्याओं को दूर करके लोगों को बहुत करीब लाता है उनके बंधन को मजबूती प्रदान करता है। यह त्यौहार दुश्मनों को आजीवन दोस्तों के रूप में बदलता है साथ ही उम्र, जाति और धर्म के सभी भेदभावो को हटा देता है। एक दूसरे के लिए अपने प्यार और स्नेह दिखाने के लिए, वे अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए उपहार, मिठाई और बधाई कार्ड देते है। यह त्यौहार संबंधों को पुन: जीवित करने और मजबूती के टॉनिक के रूप में कार्य करता है, जो एक दूसरे को महान भावनात्मक बंधन में बांधता है।
जैविक महत्व

होली का त्यौहार अपने आप में स्वप्रमाणित जैविक महत्व रखता है। यह हमारे शरीर और मन पर बहुत लाभकारी प्रभाव डालता है, यह बहुत आनन्द और मस्ती लाता है। होली उत्सव का समय वैज्ञानिक रूप से सही होने का अनुमान है।

यह गर्मी के मौसम की शुरुआत और सर्दियों के मौसम के अंत में मनाया जाता है जब लोग स्वाभाविक रूप से आलसी और थका हुआ महसूस करते है। तो, इस समय होली शरीर की शिथिलता को प्रतिक्रिया करने के लिए बहुत सी गतिविधियॉ और खुशी लाती है। यह रंग खेलने, स्वादिष्ट व्यंजन खाने और परिवार के बड़ों से आशीर्वाद लेने से शरीर को बेहतर महसूस कराती है।

होली के त्यौहार पर होलिका दहन की परंपरा है। वैज्ञानिक रूप से यह वातावरण को सुरक्षित और स्वच्छ बनाती है क्योंकि सर्दियॉ और वसंत का मौसम के बैक्टीरियाओं के विकास के लिए आवश्यक वातावरण प्रदान करता है। पूरे देश में समाज के विभिन्न स्थानों पर होलिका दहन की प्रक्रिया से वातावरण का तापमान 145 डिग्री फारेनहाइट तक बढ़ जाता है जो बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक कीटों को मारता है।

उसी समय लोग होलिका के चारों ओर एक घेरा बनाते है जो परिक्रमा के रूप में जाना जाता है जिस से उनके शरीर के बैक्टीरिया को मारने में मदद करता है। पूरी तरह से होलिका के जल जाने के बाद, लोग चंदन और नए आम के पत्तों को उसकी राख(जो भी विभूति के रूप में कहा जाता है) के साथ मिश्रण को अपने माथे पर लगाते है,जो उनके स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में मदद करता है। इस पर्व पर रंग से खेलने के भी स्वयं के लाभ और महत्व है। यह शरीर और मन की स्वास्थता को बढ़ाता है। घर के वातावरण में कुछ सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह करने और साथ ही मकड़ियों, मच्छरों को या दूसरों को कीड़ों से छुटकारा पाने के लिए घरों को साफ और स्वच्छ में बनाने की एक परंपरा है।

 

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