शारीरिक मानसिक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य में प्राणायाम की भूमिका

शारीरिक मानसिक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य में प्राणायाम की भूमिका

  • डॉ रणवीर सिंह वर्मा / सनसनी सुराग / शामली

जैसा की हम जानते हैं कि भोजन के बिना जीव कई माह तक जीवित बचा रह सकता है, पानी के बिना कई दिनों तक जीवित बचा रहेगा, परंतु श्वांस (ऑक्सीजन) के बिना तो कुछ पल भी जिंदा रहना कठिन है एवं हमारा शरीर लगभग 600 खरब कोशिकाओं का संगठित रूप है I जिस प्रकार एक-एक ईंट से मकान, एक-एक रज कण से पृथ्वी तथा एक-एक बूंद से सागर का निर्माण होता है, ठीक उसी प्रकार शरीर की रचना भी एक-एक कोशिका (Cell) के द्वारा होती है, यह शरीर की सबसे छोटी इकाई है I ये कोशिकाएं आकार में बहुत ही छोटी होती हैं, इन्हे सूक्ष्मदर्शी यंत्र से ही देखा जा सकता है I प्रत्येक कोशिका अपनी-अपनी स्वतंत्र निर्माण क्षमता, श्वसन, पोषण, उत्सर्जन, वृद्धि, चयापचय,प्रजनन,संकुचन, यापन के गुण रखती है I हमारे शरीर में लगभग 600 खरब कोशिकाएं होती हैं I इन्हीं कोशिकाओं से हमारे शरीर का निर्माण होता है I

जिस प्रकार कोशिकाओं में प्रजनन क्षमता होती है, उसी प्रकार वह मृत भी होती हैं I हमारे शरीर में लगभग 80,000 कोशिकाएं प्रति सेकेंड मृत होती रहती हैं, जो मृत्यु से पूर्व बिल्कुल अपनी जैसी कोशिका का निर्माण / सृजन कर जाती है I

जीवन के प्रारंभ से ही जीव जो भी कार्य करता है वह सब इन कोशिकाओं के द्वारा और इन्हीं के कारण संभव हो पाता है I खाना, पीना, सोना, जागना, उठना-बैठना, बोलना, सुनना, देखना, श्वासोच्छ्वास, मलमूत्र का त्याग, संतान उत्पत्ति, नियंत्रण, मरम्मत, गति आदि सभी कार्य इन्हीं कोशिकाओं के द्वारा संपादित किए जाते हैं I इसके अतिरिक्त अपनी मृत्यु से पूर्व (अपने जीवन काल में ही) अपने विभाजन द्वारा नई-नई कोशिकाओं को जन्म देना इनका कार्य है I प्रत्येक नई जन्मी कोशिका हर बात में अपनी मूल कोशिका का ही प्रतिरूप होती है I

उपरोक्त समस्त कार्यों के निष्पादन हेतु एवं जीव द्वारा खाए गए भोजन से प्राप्त पोषक रसों / तत्वों से ऊर्जा तैयार करने हेतु तथा नई-नई कोशिकाओं को जन्म देने हेतु Metabolic Activity बनाए रखने हेतु, इन समस्त (लगभग 600 खराब) कोशिकाओं को लगातार (मुख्यतः) ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है I इस प्रकार जब तक इन कोशिकाओं को ऑक्सीजन की आपूर्ति होती रहती है जीव का जीवन चक्र चलता रहता है I ऑक्सीजन की आपूर्ति में बाधा आते ही जीव बीमार होने लगता है और ऑक्सीजन की अत्यधिक कमी होने पर जीवन ही खतरे में पड़ जाता है I अर्थात जीवन चक्र को चलाए रखने का पूर्ण कार्य ऑक्सीजन की आपूर्ति के आधार पर कोशिकाओं द्वारा ही संपादित होता रहता है और यह ऑक्सीजन श्वसन क्रिया द्वारा वायुमंडल से प्राप्त होती है I यह कार्य जीव के श्वसन संस्थान द्वारा किया जाता है I श्वसन संस्थान द्वारा बाहरी वातावरण से इस ऑक्सीजन (प्राणवायु) को ग्रहण करना एवं कोशिकाओं द्वारा की गई उपरोक्त क्रियाओं के फलस्वरुप उत्पन्न हुई कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य अशुद्धियों को बाहर निकालने का कार्य श्वसन संस्थान द्वारा किया जाता है I इस क्रिया को श्वसन क्रिया कहते हैं ।

श्वसन क्रिया में निम्न शारीरिक अंगों का महत्वपूर्ण योगदान है I
(i) नासिका (ii) ग्रसनी (iii) श्वसन नलिका (iv) फेफड़े (v) श्वसनिकाएँ (vi) श्वसन कोष (वायु कोष) (vii) महाप्राचीरा (Diaphragm) (viii) पसलियां

छाती की संरचना बारह जोड़ी पसलियों के एक खोखले पिंजरे से होती है I छाती के अधिकांश भाग में दोनों फेफड़े (फफ्फुस) फैले रहते हैं, फेफड़े वजन में बहुत हल्के, असंख्य छिद्रवाली रबड़ के समान होते हैं, शंकु के आकार के इन फेफड़ों की रचना, शाखाओं प्रशाखाओं में बटी अनेक श्वसनिकाएँ, वायु कोषों तथा बहुत पतली कोशिकाओं द्वारा होती हैI यदि फेफड़ों को खोलकर फैलाया जाए तो इसका क्षेत्रफल 75-100 वर्ग मीटर होता हैI प्रत्येक फेफड़े में लगभग 30-35 करोड़ तक वायु कोष होते हैं अर्थात कुल 60-70 करोड़ वायु कोष होते हैं जहां ऑक्सीजन (o2) वायु कोष से रक्त में आ जाता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड (co2) व अन्य अशुद्धियां / विजातीय तत्व, रक्त से वायु कोष में आ जाते हैं अर्थात गैस विनिमय (Gas Exchange) का कार्य इन समस्त करोड़ों वायु कोषो में होता है I फेफड़ो में प्रति मिनट लगभग 5 लीटर रक्त गैस विनिमय हेतु आती है, जिसमें प्रति मिनट 250 मि0 लीटर ऑक्सीजन (o2) रक्त में आती हैं और 200 मि0 लीटर कार्बन डाइऑक्साइड co2 बाहर निकल जाती है I

वायु कोष जहां ऑक्सीजन व कार्बन डाइऑक्साइड गैसों का आदान प्रदान होता है, के चारों ओर बहुत पतली पतली रक्त नलिकाओं का जाल बिछा होता है, इन रक्त नलिकाओं से रक्त का एक एक अणु पंक्ति बनाकर ही बह पाता है, चल पाता है I रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन का एक अणु (हीमोग्लोबिन) ऑक्सीजन के चार अणुओं का समायोजन कर सकता है I इस प्रकार यहां अशुद्ध रक्त शुद्ध होकर (ऑक्सीजन युक्त होकर) महाधमनी में चला जाता है I जहां से हृदय में पहुंचता है, वहां से पम्प होकर शरीर की समस्त कोशिकाओं तक पहुंच जाता है I वह अपने पास की ऑक्सीजन को कोशिकाओं में स्थानांतरित कर देता है I

हृदय 1 मिनट में 70 बार धड़कता है और पूरे शरीर के लगभग 5 लीटर खून को शरीर से लेकर फेफड़ों में भेजता है और वहां शुद्धि करण के बाद, शुद्ध खून शरीर में भेजता है I खून पूरे दिन में लगभग 100,000 किलोमीटर की दूरी तय करता है I सारे शरीर से गंदगी / प्रदूषण / विजातीय तत्व इकट्ठा करता है और फेफड़ों में ऑक्सीजन के साथ शुद्ध होता है I ह्रदय एक बार में लगभग 72 मिलीलीटर रक्त महाधमनी में भेजता है, जहां से रक्त धमनियों, लघु धमनियों द्वारा पूरे शरीर में पहुंचता है और वापस वहां से गंदगी /प्रदूषण / विजातीय इकट्ठा कर लघु शिराओं , महाशिरा के माध्यम से फिर हृदय में इकट्ठा होता है I

1. *इस प्रकार श्वसन की जिस क्रिया विधि से शरीर की लगभग 600 खरब कोशिकाओं को ऑक्सीजन की समुचित आपूर्ति सुनिश्चित होती है, वह भस्त्रिका प्राणायाम कहलाता हैI*

2. *श्वसन की जिस क्रिया विधि से शरीर से कार्बन डाईऑक्साइड का पूर्ण निष्कासन, विजातीय / विषाक्त तत्वों का निष्कासन तीव्र गति से होता है वह कपालभाति प्राणायाम / क्रिया कहलाता है I*

3. *श्वसन की जिस क्रिया विधि से शरीर में स्थित समस्त नाड़ियों का शोधन होता है तथा इड़ा व् पिंगला नाड़ियों के बीच संतुलन स्थापित होकर प्राण का प्रवाह सुष्मना नाडी में होने लगता है वह अनुलोम-विलोम प्राणायाम कहलाता है I*

4. *श्वसन की जिस क्रिया विधि से मन मस्तिष्क की चंचलता, तनाव, उत्तेजना दूर होती है व ध्यान लगने लगता है वह भ्रामरी व उद्गीथ प्राणायाम कहलाते हैं I*

श्वसन क्रिया हमेशा नासिका द्वारा ही संपन्न करनी चाहिए, क्योंकि नथुनों में शुरू में बड़े बड़े व बाद में छोटे छोटे बाल होते हैं, जो वातावरण से श्वास द्वारा ली जाने वाली वायु की मोटी अशुद्धियों को रोकने, छानने का कार्य करते हैं तथा जहां नाक का ऊपरी भाग संकरा होकर कपाल से मिल जाता है, उसके थोड़ा नीचे दो छिद्र होते हैं इन छिद्रो में एक झिल्ली होती हैं जिससे सदैव श्लेष्मा रिस कर उसे चिपचिपा बनाए रखता है I श्वास के साथ नाक में प्रविष्ट सुक्ष्म कण अथवा कीटाणु इस झिल्ली /श्लेष्मा से चिपक जाते हैं और छींक द्वारा बाहर आ जाते हैं I नाक में बाहरी वायु के तापमान को नियंत्रित करने की व्यवस्था भी रहती है । इस प्रकार बाहरी वायु को स्वच्छ, गीला, निश्चित तापमान पर रखने की व्यवस्था नाक में ही है, मुँह में नहीं है । जबकि मुँह से श्वास लेने पर उक्त व्यवस्था न होने के कारण फेफड़ों पर अतिरिक्त भार पड़ता है । जिस कारण विभिन्न श्वास रोग होने की संभावना रहती है । अतः श्वास हमेशा नासिका द्वारा ही लेनी चाहिए ।

  • इं० राम औतार तायल ( बी०ई० सिविल, एम० ए० योग )

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